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(2) आर.एल.ए. ने धारा (3) एवं (4) के प्रावधानों पर विचार नहीं किया है। वे परिणाम की औचित्यता के लिए धारा 5 पर अवलम्बित है। परन्तु वह भूल गये हैं कि धारा (5) तभी प्रभावी होती है जब अनुच्छेद 198 के धारा (3) एवं (4) में निर्धारित शर्तों पर विधान परिषद् द्वारा विचार किया गया हो। धारा (3) व (4) में अपेक्षित है कि परिषद् का अधिवेशन चल रहा हो और बिल पर विचार करने का अवसर प्राप्त हो। आर.एल.ए. द्वारा अपनाया गया गठन का नियम निर्माण का एक ठोस नियम नहीं है। इस मामले से सम्बद्ध सही नियम ‘एक्स बाइसीरस एक्टस’ के नाम का नियम है। इस पर ‘कोक’ से कम के व्यक्ति को पारंगतता नहीं है। कोक ने कहा है ‘संसद’ के अधिनियम का अच्छा व्याख्याता वही हो सकता है जो सभी मुद्दों का एक साथ निर्माण करें और न कि किसी एक भाग अपने आप निर्माण करने के लिए छोड़ दें। यह अधिनियम की सबसे बड़ी स्वाभाविक एवं वास्तविक व्याख्या है कि एक अधिनियम के किसी एक भाग का अर्थ उसी अधिनियम के दूसरे भाग से लगाना ही निर्माणकर्त्ता के अर्थ की सर्वोत्तम व्याख्या करता है (क्रेज के पृष्ठ 95 पर उदधृत)
आर.एल.एल. का दूसरा आशय अनुच्छेद 197 की धारा (2)(ख) और अनुच्छेद 198 की धारा (2) में भाषा के अन्तर पर आधारित है। यह सत्य है कि भाषा में अन्तर है। यह भी सत्य है कि इच्छुक पार्टियों द्वारा भाषा में अंतर से आशय के समर्थन पर तर्क करने पर अवलम्बित नहीं रहा जा सकता कि दोनों मामलों में आशय की भिन्नता है। आर.एल.ए. के तर्क पर मैं निम्नलिखित पर तर्क करना चाहता हूँ :
अनुच्छेद 197 की धारा (2) (ख) की मूल भाषा अनुच्छेद 198 की धारा (2) के समान थी। संविधान सभा को अनुच्छेद 197 के कुल चार प्रारूप प्रस्तुत किये गये थे। पहले तीन में अनुच्छेद 198 की भाषा समान थी। मैंने इन तथ्यों को संविधान सभा के रिकार्ड से सुनिश्चित किया है। इस परिस्थिति में अनेक प्रश्न खड़े होते हैं। अनुच्छेद 198 की भाषा तब क्यों नहीं बदली गई जब अनुच्छेद 197 की भाषा बदली गई थी? अनुच्छेद 197 (2)(ख) की भाषा बदलने का क्या कारण था? क्या भाषा इसलिए बदली गई कि अनुच्छेद (2)(ख) में अन्तर्निहित मूल आशय में परिवर्तन किया गया था? या ऐसा माना गया कि आशय वही था परन्तु यह अनुभव किया गया कि नई भाषा पुराने एवं मूल आशय को बेहतर ढंग से व्यक्त करेगी? इन प्रश्नों का कोई निश्चित उत्तर देना मुश्किल है? जहाँ तक मुझे याद है कि हमने अनुच्छेद 197 की भाषा में परिवर्तन इसलिए नहीं किया था कि हमारा मूल आशय बदल जाये परन्तु चूँकि यह अनुभव किया गया था कि परिवर्तित भाषा हमारे मूल आशय को बेहतर ढंग से अभिव्यक्त करेगी। किसी भी मामले में भाषा में अन्तर पर आधारित तर्क पूरी तरह से निर्णित नहीं होंगे।