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मोनटी बनाम मेकगेविन में महामहिम कोटनहेम ने कहा कि जब संसद किसी एक विशिष्ट मामले में कार्यवाही की विशिष्ट पद्धति निश्चित करती है और किसी अन्य मामले में ऐसी पद्धति निश्चित नहीं की जाती तो सामान्य नियम के अनुसार यह ऐसा नहीं माना जाना चाहिए कि ऐसा अधिनियम तैयारकर्ताओं की उपेक्षा एवं लापरवाही से हुआ है। ‘‘परन्तु एम.आर. ब्रेट ने नोटज बनाम जेकसन (पी) के मामले में कहा है कि जो व्यक्ति संसद के अधिनियम तैयार करते हैं कभी-कभी मुहावरों का प्रयोग करते हैं। जो अन्य कोई प्रयोग नहीं करता। इसके परिणामस्वरूप हमें अधिनियम में ऐसी अभिव्यक्तियाँ मिलती हैं जिन को पढ़ कर हम यह स्वीकार करने के लिए बाध्य हो जाते हैं कि इनका प्रयोग किसी विशिष्ट उद्देश्य के लिए नहीं किया गया बल्कि तैयारकर्त्ता के बेढंगेपन के परिणामस्वरूप ऐसा हो गया है। ‘‘इस प्रकार आर. बनाम बुटल (क्यू) में प्रश्न यह था कि जब 26 व 28 विक्ट.सी. 29, एस 7 अधिनियमित किये गये तब प्रश्न यह था कि ‘‘कई आयुक्तों द्वारा पूछे गये प्रश्नों पर किसी व्यक्ति ने उत्तर के रूप में कोई अभिव्यक्ति नहीं की, सिवाय झूठी गवाही के लिए दोषारोपण के मामलों में, जिसे किसी कार्यवाही में साक्ष्य रूप से स्वीकार किया जा सके। अभिव्यक्ति ‘झूठी गवाही के लिए दोषारोपण’ सामान्यता मिथ्या शपथ पर या आयुक्तों के समक्ष ली गई मिथ्या शपथ पर लागू होती है। ऐसा लगता है कि पूर्व अधिनियम में यही प्रावधान था परन्तु उस अधिनियम में प्रयोग अभिव्यक्ति यह थी ‘‘ऐसे उत्तरों में दोषारोपण के लिए झूठी गवाही’’। परिणामस्वरूप यह तर्क दिया गया कि विधानमण्डल शब्दों के इस परिवर्तन से अर्थ परिवर्तन चाहता था। लेकिन यह स्वीकार किया गया कि बाद वाले अधिनियम में प्रयोग की गई अभिव्यक्ति के अर्थ से निश्चित रूप से सामान्य कानून के एक महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त को समाप्त कर देगा अतः यह आवश्यक रूप से मान लिया जाना चाहिए कि पूर्व अधिनियम में प्रयोग की गई भाषा को बदलने का कोई कारण नहीं था और इसके लिए सी.बी. कैले ने कहा है ‘‘जिस किसी ने भी अधिनियम को तैयार किया है उसने अव्यवस्थित रूप से कार्य किया है और उसे इसे तैयार करते समय बहुत सावधानी रखनी चाहिए थी।’’ यदि इससे यह भी प्रतीत हो कि पूर्व अधिनियम में शब्द अधिक हैं तो इन शब्दों को आगामी अधिनियम से हटा दिया जाये परन्तु विधानमण्डल का कानून को बदलने का कोई आशय न रहा हो। री वुड (आर) में एल.जे. मेलिश ने कहा है ‘‘मुझे ऐसा लगता है कि इस (बाद वाले) अधिनियम के निर्माताओं ने सोचा हो कि शब्दों को हटा देने से सुधार होगा क्योंकि मामलों में ऐसे अभिप्राय क्यों प्रस्तुत किये जाएँ। ऐसे अभिप्रायों को सिद्ध करना आवश्यक न हो, तब शब्द आधिक्य एवं भ्रामक लगते हैं और मेरा विचार है कि उन्होंने कानून को किसी रूप में परिवर्तित किये बिना इन शब्दों को उचित रूप से हटाया हो।’’ उनके तीसरे आशय के संबंध में मैं यह