104. पावती शब्द का अर्थ - Page 495

476 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

अवश्य कहूँगा कि मैं इससे पूर्णतया सहमत नहीं हूँ। यहाँ विलम्ब के दो कारण हैं जिन्हें जानना चाहिए। परिषद् द्वारा बिल प्राप्ति में विलम्ब किया गया यद्यपि सत्र चल रहा था। परिषद् द्वारा विलम्ब किया गया जब बिल सम्प्रेषित किया जा रहा था सत्र नहीं चल रहा था। परिषद् में चौदह दिन से अधिक का विलम्ब नहीं चल रहा था। परिषद् में चौदह दिन से अधिक का विलम्ब नहीं हो सकता और न ही सदन को कोई हानि हो सकती है यदि विलम्ब होता है। इसके लिए जुर्माना है जिसका प्रावधान धारा (5) में है। जब बिल सम्प्रेषित किया जाता है और परिषद् का सत्र न चल रहा हो तो विलम्ब का कारण परिषद् की गलती नहीं हो सकता। यदि वे धारा (5) का लाभ उठाना चाहें तो उन्हें परिषद् का सत्र तत्काल बुलाना चाहिए और उसे चौदह दिन का समय देकर विलम्ब को टाल दिया जाये। यह उनके अधिकार क्षेत्र में है। परन्तु वे इसे दोनों तरह से नहीं करवा सकते हैं। उन्हें यह स्वीकृति प्रदान करना कि परिषद् का सत्र बुलाये या न बुलाये यह उनके विवेक पर और इसी के साथ उन्हें धारा (5) का लाभ उठाने की स्वीकृति प्रदान करने से उन्हें ने केवल विधानमण्डल के एक सदन को धोखा देने की स्वतंत्रता मिलेगी बल्कि संविधान के साथ धोखा करने का भी अवसर मिलेगा। यह बिल्कुल वैसा ही है जो बिहार सरकार ने किया है। जब वित्त विधेयक उच्च सदन में सम्प्रेषित कर दिया गया था तो सरकार का यह दायित्व था कि परिषद् का सत्र बुलाये और यह मामला पूर्णतया और केवल उनके अधिकार क्षेत्र में था। यदि ऐसा नहीं किया जाता तो अनुच्छेद 198 की धारा (5) का लाभ नहीं लिया जा सकता। इन कारणों से मैं विद्वान महाधिवक्ता, बिहार के विचारों से सहमत हूँ और विद्वान आर.एल.ए. के विचारों को रद्द करता हूँ। मैं उनका सम्मान करता हूँ। अन्यथा मैंने तुरन्त ही इसे रद्द कर दिया होता। मुझे यह मुद्दा स्पष्ट रूप में समझ आ चुका है। यह इतनी साधारण सी बात है कि जिस व्यक्ति के पास सामान्य ज्ञान से अधिक कुछ नहीं है वह भी संविधान निर्माताओं के आशय को समझ गया होगा। बिहार सरकार ने जो कुछ किया है वह एक पूर्व-निर्धारित धोखेबाजी से किया गया है। मैं इस मामले से इंकार करता हूँ कि इसने जो कुछ किया है वह समझौता करने की इच्छा से किया है। मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं हो रहा है कि बिहार सरकार धोखे-धड़ी के न्यूनतम स्तर तक गिर गई है। मैंने इसे इतनी गंभीरता से लिया है कि मुझे इस बात का बिल्कुल भी दुःख नहीं होगा यदि इस संबंध में मेरी भावनायें बिहार सरकार को संप्रेषित कर दी जाती हैं।

इसे समाप्त करने से पूर्व मैं एक प्रश्न पूछना चाहता हूँ जो केवल विधि विभाग के विचारणीय है। हमें राज्य सरकार से संविधान से उत्पन्न विवादास्पद मुद्दों पर परामर्श देने के लिए पत्र प्राप्त हो रहे हैं। इन पत्रों पर विचार कर अपना परामर्श