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दे रहे हैं। इस परामर्श का अनुपालन किया जाता है तो यह संवैधानिक व्यावहारिक हिस्सा बन जायेगा। मुझे आश्चर्य है कि क्या हम ऐसा बुद्धिमत्ता से कर रहे हैं। क्या ये बेहतर नहीं होगा कि पार्टियाँ जैसा करना चाहें, उन्हें वैसा करने दिया जाए और उनके मामले को न्यायालय में ले जाया जाए जैसा कि अधिनियम कानून पृ.(10) द्वारा इंगित किया गया है कि अधिनियम की व्याख्या में व्यावहारिकता एक महत्त्वपूर्ण तत्व होता है। हमारे अपने परामर्श से हमने व्यावहारिकता को स्थापित और इसके पश्चात् किसी विशिष्ट व्याख्या का समर्थन किया है जो कि इसकी अनुपस्थिति में समर्थनीय नहीं हो सकता है और यदि हमारा परामर्श गलत है तो हम गलत व्याख्या के लिए उत्तरदायी होंगे। शायद यह काफी लम्बा विचारणीय मुद्दा है और मैं अनुभव करता हूँ कि इसे बन्द करना कठिन होगा। इसके साथ ही यह याद रखना होगा कि इन मामलों में हमारा उत्तरदायित्व कितना बड़ा है।
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बी.आर. अम्बेडकर
इस लेख के संबंध में यह उल्लेखनीय है कि तत्कालीन विशेष कार्य अधिकारी, डॉ. बाबा साहब अम्बेडकर स्रोत सामग्री प्रकाशन समिति, ने पाया कि वर्ष 1979 में महाराष्ट्र राज्य के महा-प्रशासक से सरकार द्वारा प्राप्त रिकार्ड में दस्तावेज मिल गये हैं। यह टिप्पण डॉ. अम्बेडकर द्वारा हस्ताक्षरित है।
सम्पादक