105. बुद्ध एवं उसके धर्म का भविष्य - Page 497

478 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

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बुद्ध एवं उसके धर्म का भविष्य
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धर्म के अनेक प्रवर्तकों में से केवल चार ऐसे हैं जिनके धर्म ने विश्व को प्रारम्भ में संचालित किया परन्तु अभी भी विशाल जन-समुदाय पर अपना प्रभुत्व जमाये हुए हैं। ये हैं बुद्ध, ईसा, मोहम्मद एवं कृष्ण। इन चारों के व्यक्तित्व और अपने-अपने धर्मों के प्रचार से जो छवि उन्होंने प्राप्त की है, उसमें एक ओर बुद्ध तथा शेष को दूसरी ओर रखकर तुलना करने पर कई अन्तर झलकते हैं, जो महत्त्वपूर्ण हैं।

पहला मुद्दा जो बुद्ध को शेष से अलग करता है वह है उसका आत्म त्याग। सम्पूर्ण बाइबिल में ईसा इस बात पर अडिग रहे कि वह ईश्वर का बेटा है जो ईश्वर के साम्राज्य में प्रवेश करना चाहेगा, वह असफल होगा यदि वे उसे ईश्वर के बेटे के रूप में स्वीकार नहीं करेंगे। मोहम्मद एक कदम और आगे बढ़ गये। ईसा की तरह उन्होंने भी दावा किया कि वह धरती पर ईश्वर के दूत हैं। परन्तु वह इस बात पर भी अडिग रहे कि वह अन्तिम दूत हैं। इस आधार पर उन्होंने घोषणा की कि यदि कोई मोक्ष चाहता है तो वह न केवल मुझे ईश्वर का दूत स्वीकार करे बल्कि यह भी स्वीकार करे कि मैं ईश्वर का अन्तिम दूत हूँ। कृष्ण दोनों मोहम्मद एवं ईसा से एक कदम और आगे बढ़ गये। वह केवल ईश्वर का अन्तिम दूत होने या ईश्वर का दूत होने से ही सन्तुष्ट नहीं हुए। वह अपने आपको ईश्वर कहने से भी संतुष्ट नहीं हुए। उन्होंने दावा किया कि वे ‘परमेश्वर’ हैं या जैसे कि उनके अनुयायी उनको ‘देवाधिदेव’ देवताओं के भी देवता मानते हैं। बुद्ध ने कभी भी अपने लिए किसी ऐसी हैसियत की अनुचित माँग नहीं की। उसने एक मनुष्य के पुत्र के रूप में जन्म लिया और सामान्य जन बने रहने पर संतुष्ट थे और एक सामान्य जन के रूप में अपने धार्मिक सिद्धान्तों का प्रचार किया। उन्होंने कभी किसी अलौकिक पुरुष या अलौकिक शक्ति का दावा नहीं किया और न ही अपनी अलौकिक शक्ति को सिद्ध करने के लिए चमत्कार किया। बुद्ध ने मार्गदर्शक और मोक्षदाता के मध्य एक स्पष्ट अन्तर किया है। ईसा, मोहम्मद एवं कृष्ण ने अपने लिए मोक्ष का दावा किया है। बुद्ध मार्गदर्शक की भूमिका निभाने में ही संतुष्ट थे। चारों धार्मिक गुरुओं में और भी अन्तर है। ईसा एवं मोहम्मद दोनों ने दावा किया है कि वे जो शिक्षा दे