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रहे हैं वे ईश्वर के शब्द हैं चूँकि ईश्वर के शब्द होने के कारण वे जो शिक्षा दे रहे हैं वह अचूक है और इस पर प्रश्न नहीं किया जा सकता। कृष्ण ने जो शिक्षा दी है वह ईश्वर के शब्द, ईश्वर द्वारा उच्चारित शब्द हैं इसलिए ये आदर्श एवं अन्तिम शब्द हैं जिनका अचूकता के संबंध में प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता। बुद्ध ने जैसी भी शिक्षा दी, उसकी ऐसी अचूकता का कभी दावा नहीं किया। ‘महापरिनिभाना सुत्त’ मैं उन्होंने आनंद से कहा था कि उसका धर्म कारण एवं अनुभव पर आधारित है और उसके अनुयायी उसकी शिक्षा को केवल सही एवं बाध्यकारी मानकर स्वीकार न करें क्योंकि ये उससे उदभूत है। कारण एवं अनुभव पर आधारित होने के कारण वे उसकी किसी शिक्षा में संशोधन या उसे त्यागने के लिए स्वतंत्र हैं यदि यह पाया जाता है कि यह किसी समय और किन्हीं परिस्थितियों में ये लागू नहीं होती। उनकी कामना है कि उनका धर्म पूर्व की मृत मान्यताओं के साथ उलझा न रहे। वह चाहते थे कि यह हर समय सदाबहार एवं उपयोगी रहे। यही कारण था कि उन्होंने अपने अनुयायिओं को यह स्वतंत्रता दी हुई थी कि समय व मामले की माँग एवं अपेक्षाओं के अनुसार इसमें सुधार करने के लिए स्वतंत्र हैं। किसी अन्य धर्म-गुरु ने ऐसा साहस नहीं दिखाया है। वे संशोधन की स्वीकृति देने से डरते रहे। चूँकि सुधार की स्वतंत्रता का प्रयोग उस ढांचे को गिराने में भी किया जा सकता है जिसका उन्होंने पोषण किया है। बुद्ध को ऐसा कोई भय नहीं था। वह अपनी नींव से आश्वस्त थे। वे जानते थे कि घोर रूढि़ भंजक भी उसके धर्म के अंतरतम् को नष्ट करने में समर्थ नहीं होगा।
II.
बुद्ध की ऐसी अद्वितीय स्थिति है। उसके धर्म के संबंध में क्या है? इसकी तुलना इसके प्रतिद्वन्द्वियों द्वारा स्थापित धर्म से कैसे की जाए? हम पहले बौद्ध धर्म की हिन्दूवाद से तुलना करते हैं। थोड़ा-सा स्थान उपलब्ध होने के कारण तुलना कुछ महत्त्वपूर्ण मुद्दों वास्तव में केवल दो तक सीमित होनी चाहिए।
हिन्दूवाद एक धर्म है जो सदाचार पर स्थापित नहीं किया गया। जो भी सदाचार हिन्दूवाद में है वह उसका अभिन्न अंग नहीं है। यह धर्म में सम्मिलित नहीं है। यह एक अलग ताकत है जो सामाजिक आवश्यकताओं द्वारा संरक्षित है न कि हिन्दू धर्म की हिदायतों पर संरक्षित है। बुद्ध का धर्म सदाचार है। यह धर्म में सम्मिलित है। बुद्ध का कोई धर्म नहीं है यदि उसमें सदाचार नहीं है। यह सत्य है कि बुद्ध धर्म में कोई देवता नहीं है। देवता के स्थान पर सदाचार है। अन्य धर्मों में जो स्थान देवता का है बुद्ध धर्म में वही स्थान सदाचार का है।