105. बुद्ध एवं उसके धर्म का भविष्य - Page 499

480 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

यह बहुत ही कम मान्य है कि उसने ‘धम्म’ शब्द का अत्यन्त क्रान्तिकारी अर्थ प्रतिपादित किया है। ‘धर्म’ शब्द के वैदिक अर्थ में किसी भी रूप में सदाचार का संकेत नहीं मिलता है। ब्राह्मणों द्वारा उच्चारित एवं ‘यामिनी’ के पूर्ण-मीमांसा’ में प्रतिपादित ‘धर्म’ का अर्थ कुछ कार्यों के प्रदर्शन या रोमन शब्दावली में धार्मिक कर्मकाण्डों के लिए प्रयोग शब्द से है। ब्राह्मणों के लिए धर्म का अर्थ कर्मकाण्डों, अर्थात् यज्ञना, यज्ञ और देवताओं को बलि, को करते रहना है।

बुद्ध द्वारा प्रयुक्त शब्द ‘धम्म’ का धार्मिक रीति-रिवाजों एवं कर्मकाण्डों से कोई लेन-देन नहीं है। वास्तव में उसने यज्ञ और यज्ञना को धर्म का सार होने के रूप में सदाचार को प्रतिस्थापित किया है। यद्यपि ‘धम्म’ शब्द का प्रयोग ब्राह्मण अध्यापकों के साथ-साथ बुद्ध ने भी किया है परन्तु मौलिक एवं मूलभूत रूप से दोनों के आशय से अन्तर है। वास्तव में यह कहा जा सकता है कि बुद्ध विश्व में पहला अध्यापक था जिसने सदाचार को धर्म का सार एवं नींव बनाया हो। भगवद् गीता से यह देखा जा सकता है कि कृष्ण भी धर्म की रीति-रिवाज एवं कर्मकाण्डों जैसी पुरानी मान्यताओं से अपना उद्धार नहीं कर पाये। ऐसा प्रतीत होता है कि अनेक लोग भगवद् गीता में कृष्ण द्वारा दिये गये उपदेश निष्काम कर्म या अनासक्ति योग के सिद्धान्त द्वारा प्रलोभित या आकर्षित हुए हैं। इसका यह अर्थ माना गया है कि बालचर की भावना से नेक काम, फल की इच्छा किये बिना करते रहना चाहिए। निष्काम कर्म की व्याख्या इसके वास्तविक अर्थ में पूर्णतया भ्रामक है। निष्काम कर्म वाक्यांश में कर्म शब्द का अर्थ साधारण शब्दावली में कार्य नहीं है। कर्म का अर्थ है ‘काम’ इसका प्रयोग इसके मौलिक रूप में प्रयोग इस प्रकार से किया गया है जिस प्रकार ब्राह्मणों और ह्ममिनी द्वारा प्रयोग किया गया है। कर्मकाण्डों की दृष्टि से जैमिनी एवं भगवद् गीता में केवल एक ही अन्तर है। ब्राह्मणों द्वारा किये जा रहे कर्मकाण्ड दो वर्गों में आते हैं।

  1. नित्य कर्म और

  2. नेमितिक कार्य

नित्य कर्म ऐसे कर्मकाण्ड हैं जिन्हें नियमित रूप से करने के निर्देश हैं इसलिए इन्हें नित्य कहा गया है और धार्मिक दायित्व होने के कारण इससे फल की कोई कामना नहीं की जाती। इसलिए इन्हें निष्काम कर्म भी कहा जाता है। कर्म की अन्य श्रेणी को नेमितक कहा जाता था, इस संबंध में ऐसा कहा जाता है कि ये तभी किये जाते हैं जब कभी इसके लिए अवसर हो अर्थात् जब कभी उनको करने की इच्छा हो और इन्हें काम कर्म कहा गया है क्योंकि उनके निष्पादन से कुछ लाभ की आशा