105. बुद्ध एवं उसके धर्म का भविष्य - Page 500

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की जाती है। कृष्ण ने भगवद् गीता में काम कर्म की निन्दा की है। उन्होंने निष्काम कर्म की निन्दा नहीं की है। दूसरी ओर उन्होंने इसकी पं्रशसा की है। यह याद रखने की बात है कि कृष्ण के धर्म में सदाचार निहित नहीं है। इसमें निष्काम कर्म श्रेणी के माध्यम से यज्ञना और यज्ञ निहित है।

यह हिन्दूवाद और बौद्धिकता में अन्तर का एक मुद्दा है। अन्तर का दूसरा मुद्दा इस तथ्य में निहित है कि हिन्दूवाद का मान्य धार्मिक सिद्धान्त असमानता है। चतुर्वर्ण का सिद्धान्त असमानता के इस धार्मिक सिद्धान्त का ठोस प्रतिरूप है। दूसरी ओर बौद्ध समानता पर अडिग है वह चतुर्वर्ण का घोर विरोधी है। उन्होंने न केवल इसके विरुद्ध प्रचार व संघर्ष किया है बल्कि इसके उन्मूलन के लिए हर संभव प्रयास किये हैं। हिन्दूवाद के अनुसार न तो शूद्र और न ही महिला धार्मिक गुरु बन सकते हैं और नहीं यह सन्यास धारण कर ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं। दूसरी और बुद्ध ने शूद्र को भिक्खुन संघ में सम्मिलित किया है। उन्होंने महिलाओं को भी सम्मिलित किया है ताकि वे भिक्खनी न बन सकें। उन्होंने ऐसा क्यों किया? बहुत कम लोग इस कदम के महत्त्व को समझ सकते हैं। इसका उत्तर यह है कि बुद्ध असमानता के सिद्धान्त को नष्ट करने के लिए यह ठोस कदम उठाना चाहते थे। हिन्दूवाद को बुद्ध द्वारा किये गये आक्रमण के परिणामस्वरूप अपने सिद्धान्त में कई संशोधन करने चाहिए थे। इसने हिंसा का त्याग कर दिया। यह वेदों की निर्भ्रान्ति के सिद्धान्त को समाप्त करने के लिए बनाया गया था। चतुर्वर्ण के मुद्दे पर कोई भी परित्याग करने को तैयार नहीं था। यही कारण है कि ब्राह्मणवाद को जैन धर्म की तुलना में बुद्ध धर्म के विरुद्ध अधिक नफरत एवं विरोध है। हिन्दूवाद को चतुर्वर्ण के विरुद्ध बुद्ध के तर्कों को मान्यता देनी चाहिए थी। परन्तु इसके तर्क के आगे झुकने की बजाय हिन्दूवाद ने चतुर्वर्ण के लिए नई दार्शनिक औचित्यता विकसित कर दी। नया दार्शनिक औचित्य भगवद् गीता में देखा जा सकता है। कोई भी व्यक्ति निश्चित रूप से यह नहीं कह सकता कि भगवद् गीता क्या शिक्षा देती है। परन्तु इस पर प्रश्न नहीं किया जा सकता कि भगवद् गीता चतुर्वर्ण के सिद्धान्त की स्वीकृति प्रदान करती है। वास्तव में यह प्रतीत होता है कि इसका मुख्य उद्देश्य यही था जिसके लिए उसे स्वीकृति प्रदान की गई। उसी के लिए यह लिखी गई थी और भगवद् गीता से इसे कैसे प्रमाणित किया? कृष्ण ने कहा है कि उसने देवता के रूप में चतुर्वर्ण प्रणाली सृजित की है और उसने उसका निर्माण गुण-कर्म के सिद्धान्त के आधार पर किया है जिसका अर्थ है कि उसने प्रत्येक व्यक्ति की हैसियत और व्यवसाय को उसके सहज गुणों के अनुसार नियत किया है। दो चीजें स्पष्ट हैं। एक यह कि सिद्धान्त नया है। पुराना सिद्धान्त भिन्न था। पुराने सिद्धान्त के अनुसार