482 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
चतुर्वर्ण का प्रतिष्ठान करना वेदों के प्रभुत्व में था। चूंकि वेद अचूक थे इसलिए चतुर्वर्ण की प्रणाली इसी पर आधारित है। वेदों की अचूकता पर बुद्ध के आक्रमण ने चतुर्वर्ण के पुराने प्रतिष्ठान की वैधता को नष्ट कर दिया। यह बिल्कुल स्वाभाविक है कि हिन्दूवाद, जो चतुर्वर्ण को छोड़ने के लिए तैयार नहीं था और जो इसे इसकी आत्मा मानता है, इसके लिए बेहतर प्रतिष्ठान खोजने का प्रयास कर रहा है जिसे भगवद् गीता ने करना प्रस्तावित किया है। परन्तु भगवद् गीता में कृष्ण द्वारा दिये गये नये प्रमाण कितने अच्छे हैं? अधिकतम हिन्दुओं की ओर से यह विश्वसनीय लगता है, इतना विश्वसनीय लगता है कि वे इसे अखण्डनीय मानते हैं। कई गैर-हिन्दुओं को भी यह अत्यधिक न्यायसंगत व प्रलोभित/आकर्षित करने वाला प्रतीत होता है। यदि चतुर्वर्ण केवल वेदों की प्रभुसत्ता पर आधारित होता तो मुझे पूरा विश्वास है कि यह काफी समय पूर्व लुप्त हो चुका होता। यह भगवद् गीता का अनिष्टकारी एवं गलत सिद्धान्त है जिसने यह चतुर्वर्ण दिया है और इस चतुर्वर्ण ने जाति-प्रथा को जन्म दिया है इससे जीवन मूल्यों में लगातार गिरावट आ रही है। इस नये सिद्धान्त की मूल धारणा सांख्य दर्शन से ली गई है। इसमें कुछ भी मौलिक नहीं है। कृष्ण ने अपनी मौलिकता चतुर्वर्ण को न्यायोचित ठहराने में लगाई है। इसके प्रयोग में भी भ्रम है, सांख्य प्रणाली के लेखक कपिल ने स्वीकार किया है कि कोई ईश्वर नहीं है, ईश्वर की आवश्यकता केवल इसलिए है क्योंकि पदार्थ को मृत मान लिया गया है। लेकिन पदार्थ कभी मरता नहीं है। यह सक्रिय है। पदार्थ तीन गुणों से बना हुआ है। राजस, तमस और सत्त्व। प्रकृति मृत हो चुकी प्रतीत होती है। क्यांकि तीनों गुण संतुलित मात्रा में है। जब यह संतुलिन किसी एक गुण के कारण बिगड़ता है, जब कोई गुण अन्य गुणों पर हावी हो जाता है तो प्रकृति सक्रिय हो जाती है। यह सांख्य दर्शन का सार एवं तात्पर्य है। इस सिद्धान्त के साथ कोई झगड़ा नहीं हो सकता। शायद यह सत्य है। अतः यह माना जा सकता है कि प्रत्येक व्यक्ति प्रकृति के रूप में तीन गुणों से निर्मित है। यह भी स्वीकार किया जा सकता है कि तीनों के प्रभुत्व के लिए परस्पर प्रतिस्पर्धा होती है। परन्तु यह कैसे मान लिया जाए कि किसी समय कोई विशिष्ट गुण किसी व्यक्ति पर हावी होता है - मान लिया जाए कि एक व्यक्ति के जन्म के समय एक गुण अन्य गुणों पर हावी है तो ये गुण मृत्यु तक हमेशा हावी रहेंगे। इस धारणा के लिए सांख्य दर्शन या वास्तविक जीवन के लिए कोई आधार नहीं है। दुर्भाग्य से जब कृष्ण ने अपना सिद्धान्त प्रतिपादित किया जब न तो हिटलर और न ही मुसोलिनी का जन्म हुआ था। कृष्ण को यह स्पष्ट करने में अत्यन्त कठिनाई हुई होती कि एक साइन बोर्ड पेन्टर और राजमिस्त्री विश्व