105. बुद्ध एवं उसके धर्म का भविष्य - Page 502

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पर प्रभुत्व जमाने के लिए तानाशाह कैसे बन गये। विचारणीय मामला यह है कि व्यक्ति की प्रकृति हमेशा बदलती है क्योंकि गुणों से सम्बद्ध स्थिति हमेशा बदलती रहती है। यदि गुणसत्ता की अपनी सम्बद्ध स्थिति में हमेशा परिवर्तन होता रहता है तो पुरुषों के वर्णों में स्थायी एवं स्थिर वर्गीकरण नहीं हो सकता और व्यवसाय भी नियत नहीं हो सकता। अतः भगवद् गीता का पूरा सिद्धान्त समाप्त हो जाता है। परन्तु जैसा मैंने कहा है कि हिन्दू इसके सत्याडम्बर और चकाचौंध पर मुग्ध होकर इसके दास बन गये हैं। इसका परिणाम यह है कि हिन्दूवाद ने अपनी सामाजिक असमानता के सिद्धान्त के साथ वर्ण पद्धति को अपनाया हुआ है। हिन्दूवाद में यह दो बुराइयाँ हैं जिनसे बौद्ध धर्म मुक्त है।

III.

कुछ ऐसे लोग जो मानते हैं कि केवल बुद्ध के सिद्धान्तों को स्वीकार करने से हिन्दुओं को बचाया जा सकता है, को बहुत दुःख होता है क्योंकि उनको भारत में बौद्ध धर्म वापिस आने की संभावना या पुनरुद्धार दिखाई नहीं दे रहा है। मैं इस निराशावादी दृष्टिकोण का भागीदार नहीं हूँ।

अपने धर्म के संबंध मैं अपने रवैये के मामले में आज हिन्दू दो वर्गों में बंट गये हैं। इनमें से कुछ का मानना है कि ‘‘हिन्दू सहित सभी धर्म सत्य हैं’’ और अन्य धर्मों के नेता भी इनकी इस घोषणा में सम्मिलित हो गये प्रतीत होते हैं। इस प्रतिपाद्य से झूठा कोई प्रतिपाद्य नहीं हो सकता कि सभी धर्म सत्य हैं। लेकिन हिन्दुओं के इस नारे से उनको अन्य धर्मों के अनुयायियों से समर्थन प्राप्त होता है। यहाँ कुछ ऐसे हिन्दू भी हैं जिनको अब अनुभव हो चुका है कि उनके धर्म में कुछ गलत है परन्तु वे उसकी खुले रूप में भर्त्सना नहीं कर सकते। यह रवैया समझने योग्य है। धर्म सामाजिक विरासत का एक हिस्सा होता है। प्रत्येक व्यक्ति का जीवन, प्रतिष्ठा एवं आत्म-सम्मान इससे जुड़ा होता है। अपने धर्म का परित्याग करना आसान नहीं है ‘मेरा देश’ सही है या गलत है परन्तु प्रत्येक मनुष्य में देशभक्ति होती है। मेरा ‘धर्म’ गलत है या सही। इसका परित्याग करने की बजाय हिन्दू बचने के अन्य उपाय ढूंढ रहे हैं। कुछ अपने आपको हम बात से सांत्वना दे रहे हैं कि सभी धर्म गलत हैं। इसलिए धर्म के संबंध में चिंता क्यों की जाए। स्वदेश प्रेम की यह भावना बौद्ध धर्म को अंगीकार करने से रोकती है। ऐसे रवैये का केवल एक परिणाम हो सकता है। हिन्दूवाद का पतन हो जाएगा और जीवन की सत्ताशक्ति नहीं रहेगी। यह प्रभावहीन हो जायेगा जिससे हिन्दू समाज विखण्डित हो जायेगा। जब वे ऐसा करेंगे तो उसके समक्ष बौद्ध धर्म अपनाने के सिवाय कोई विकल्प नहीं होगा।