105. बुद्ध एवं उसके धर्म का भविष्य - Page 503

484 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

यह केवल एक ही आशा की किरण नहीं है। बल्कि ऐसी ही किरणें अन्य धर्मों से भी आ रही हैं।

एक प्रश्न का उत्तर सभी धर्मों का अवश्य देना चाहिए। इससे शोषितों एवं उत्पीडि़तों को कितनी मानसिक एवं नैतिक राहत मिल रही है। यदि ऐसा नहीं है तो इसका विनाश हो रहा है। क्या हिन्दूवाद से पिछड़ी जातियों एवं अनुसूचित जातियों के लाखों लोगों को मानसिक एवं नैतिक राहत मिल रही है? ऐसा नहीं है। क्या हिन्दू इन पिछडद्यी जातियों एवं अनुसूचित जातियों से आशा करें कि वे हिन्दूवाद की छत्रछाया में रहे जो उन्हें मानसिक एवं नैतिक राहत का कोई वचन नहीं देता। ऐसी आशा करना बिल्कुल निरर्थक होगा। हिन्दूवाद ज्वालामुखी पर तैर रहा है। वर्तमान में विलुप्त होता प्रतीत हो रहा है। परन्तु यह नहीं होगा। यह एक बार सक्रिय होगा जब पिछड़ी जातियों एवं अनुसूचित जाति के लाखां लोग अपनी गिरावट के प्रति जागरूक होंगे और उनको ज्ञात होगा कि ऐसा हिन्दू धर्म की सामाजिक दार्शनिकता के कारण हो रहा है। हम सब को याद होगा कि रोमन साम्राज्य में ईसाइयों ने अन्ध विश्वासियों को उखाड़ फेंका था। जब जन समुदाय को अनुभव हुआ कि अन्धविश्वास से उन्हें मानसिक एवं नैतिक राहत नहीं मिल सकती तो उन्होंने उसका त्याग कर दिया और ईसाई धर्म को अपना लिया। जो कुछ रोम में हुआ वही भारत में अवश्य होगा। जब हिन्दू समुदाय अन्धविश्वास से मुक्त होंगे तो निश्चय ही बौद्ध धर्म की ओर मुड़ेंगे।

IV.

हिन्दूवाद एवं बौद्ध धर्म के बीच तुलना से अन्य गैर-हिन्दू धर्म अपनी बौद्ध धर्म की तुलना में कहाँ ठहरेंगे? इन गैर हिन्दू धर्मों की बौद्ध धर्म से विस्तृत रूप से तुलना करना असंभव है। समग्र रूप से मैं अपना निष्कर्ष सार रूप में प्रस्तुत करता हूँ। मेरा मानना है कि :

( i ) कि समाज को संगठित रखने के लिए कानून की स्वीकृति या सदाचार

की सहमति होनी चाहिए। किसी एक के बिना समाज निश्चित रूप से

खंडित होने के कगार पर चला जायेगा।

सभी समाजों में कानून बहुत ही छोटी-सी भूमिका निभाता है। इसका

उद्देश्य अल्पसंख्यकों को सामाजिक अनुशासन में रखना होता हैं बहुमत

को अपने सामाजिक जीवन के संरक्षण और सदाचार की सहमति के

लिए छोड़ देना चाहिए। अतः प्रत्येक समाज में सदचार के रूप में धर्म