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हमेशा शासकीय सिद्धान्त में रहना चाहिए।
( ii ) प्रथम वक्तव्य में पारिभाषिक धर्म विज्ञान के अनुरूप होना चाहिए। यदि
यह विज्ञान के अनुरूप नहीं होगा तो धर्म को अपना सम्मान खोना पड़ेगा
और इस प्रकार उपहास नहीं होगा और जीवन के शासकीय सिद्धान्त के
रूप में अपनी शक्ति को ही नहीं खो देगा बल्कि कालान्तर में विखणि्
डत एवं विलुप्त हो जाएगा। दूसरे शब्दों में यदि धर्म को अपने
कार्य कलाप करने हैं तो यह कार्यकलाप कारण के अनुसार होने चाहिए
जो कि विज्ञान का दूसरा नाम है।
( iii ) कि धर्म को सामाजिक सदाचार की संहिता के रूप में एक और परीक्षा
के लिए भी तैयार रहना चाहिए। यह पर्याप्त नहीं है कि धर्म नैतिक
संहिता से बने परन्तु इसकी नैतिकता/सदाचार की संहिता स्वतंत्रता,
समानता एवं मित्रता के मूलभूत सिद्धान्तों को मान्यता प्रदान करें। यदि
धर्म सामाजिक जीवन के इन मूलभूत सिद्धान्तों को मान्यता नहीं प्रदान
करेगा तो धर्म विलुप्त हो जायेगा।
( iv ) कि धर्म गरीबी की इजाजत या बढ़ावा देने वाला नहीं होना चाहिए।
सम्पन्नता में वैराग्य एक सुखद स्थिति है परन्तु दरिद्रता में सुखद स्थिति नहीं हो सकती। दरिद्रता को सुखद स्थिति बताने से धर्म को गुमराह करना दुराचार एवं अपराध को बढ़ावा देना और धरती को जीवन्त नर्क बनाने की स्वीकृति देना है।
कौन-सा धर्म इन अपेक्षाओं को पूर्ण करता है? इस प्रश्न पर विचार करते हुए यह अवश्य याद रखना चाहिए कि महात्माओं के दिन लद गये और विश्व में कोई नया धर्म नहीं हो सकता। विद्यमान धर्मों में से ही विकल्प चुनना होगा। अतः प्रश्न विद्यमान धर्मों तक ही सीमित रहेगा। यह संभव हो सकता है कि कोई विद्यमान धर्म इनमें से एक कोई दो परीक्षायें उत्तीर्ण कर सके। प्रश्न यह है :- क्या यहाँ कोई धर्म है जो इन सभी परीक्षाओं को उत्तीर्ण कर सकेगा। जहाँ तक मैं जानता हूँ केवल बौद्ध धर्म ही इन सभी परीक्षाओं में खरा उतरता है। दूसरे शब्दों में केवल बौद्ध धर्म ऐसा धर्म है जो विश्व धारण कर सकता है। यदि नया विश्व जैसा भी हो, पुराने से भिन्न होगा और उसका धर्म अवश्य होगा और नये विश्व को पुराने विश्व की अपेक्षा बेहतर धर्म की आवश्यकता होगी तब केवल बुद्ध का ही धर्म हो सकता है।
यह सभी सुनने में बड़ा विचित्र लगता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि अधिकतर लोग