105. बुद्ध एवं उसके धर्म का भविष्य - Page 508

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लड़का या लड़की अपने माता-पिता की सम्पत्ति के साथ-साथ अपने माता-पिता के धर्म को भी विरासत में लेता था। धर्म की गुणवत्ता एवं महानता की जाँच करने का कोई प्रश्न ही नहीं था। कई बार उत्तराधिकारी प्रश्न करते थे कि क्या माता-पिता द्वारा छोड़ी गई सम्पत्ति स्वीकार योग्य है। परन्तु यहाँ ऐसा कोई उत्तराधिकारी नहीं था जो प्रश्न करे कि क्या उसके माता-पिता का धर्म ग्रहण के योग्य है। ऐसा लगता है कि समय बदल गया है। पूरे विश्व में अनेक लोगों ने अपने धर्म की विरासत के संबंध में अभूतपूर्व साहस प्रदर्शित किया है। वैज्ञानिक तथ्यों से प्रभावित होकर, अनेक लोग इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि धर्म एक भ्रान्त धारणा है, जिसे त्याग दिया जाना चाहिए। ऐसे अन्य लोग भी हैं जो मार्क्सवाद के प्रभाव से इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि धर्म एक नशा (अफीम) है जो गरीब व्यक्ति को धनवान् के प्रभुत्व के आगे झुकने के लिए प्रेरित करता है और इसलिए इसका त्याग कर देना चाहिए। कारण कुछ भी रहा हो वास्तविकता यही रहेगी कि लोगों का धर्म के प्रति रुझान अन्वेषी हो गया है। और कि यह प्रश्न कि धर्म धारण करने योग्य है और यदि हाँ तो कौन-सा धर्म धारण करने योग्य है, यह प्रश्न उन व्यक्तियों के मन में सर्वोपरि रूप से बना हुआ है जो इस विषय में सोचने का साहस दिखाते हैं। अब समय आ गया कि इच्छित को दृढ़ इच्छा शक्ति से प्राप्त किया जा सकता है। जो बौद्धिक धर्म को मानने वाले देश हैं उनके लिए बौद्ध के प्रचार-प्रसार का कार्य कठिन नहीं होगा। उन्हें यह समझना चाहिए कि एक बौद्ध का कर्त्तव्य केवल एक अच्छा बौद्ध होना ही नहीं है बल्कि बौद्ध धर्म का प्रचार करना उसका दायित्व होना चाहिए। उन्हें इस बात पर विश्वास करना चाहिए कि बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार ही मानवता की सेवा है।