490 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
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महाबोधि पत्रिका के मार्च, 1950 अंक में लामा गोविन्द का ‘‘हिन्दूवाद एवं बौद्ध धर्म में महिलाओं की स्थिति’’ लेख छपा था। इनका लेख ईवस् वीकली के 21 जनवरी, 1950 के संस्करण में प्रकशित लेख का प्रत्युत्तर था और इस लेख में बुद्ध को आरोपित किया था कि मनुष्य होने के नाते उसकी शिक्षायें भारत में महिलाओं की स्थिति में गिरावट के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार हैं। लामा गोविन्द ने अपना कर्त्तव्य भली-भाँति निभाया। प्रत्येक बौद्ध को आगे बढ़कर आरोप का खण्डन करना चाहिए था। परन्तु मामला यहीं नहीं समाप्त हो सका। ऐसा पहली बार नहीं हुआ था कि बुद्ध पर ऐसे आरोप लगाये गये हों। ऐसा प्रायः ऐसे लोगों द्वारा किया जाता था जो बुद्ध की महानता को सहन नहीं कर सकते थे और उन वर्गों में थे जो ईवस् वीकली के लेखक से हर दृष्टि से बड़े थे। अतः यह आवश्यक है कि मामले पर गंभीरता से विचार किया जाए और बार-बार यह आरोप लगाने के आधार की जाँच की जाए। आरोप इतना गंभीर एवं घटिया है कि, मुझे विश्वास है, महाबोधि के पाठक इस मामले में और अधिक जाँच का स्वागत करेंगे।
बुद्ध के विरुद्ध ऐसे आरोप को केवल दो आधारों पर समर्थित किया जा सकता है :
पहला आधार संभवतः आनन्द द्वारा बुद्ध से पूछे गये प्रश्न का दिया गया उत्तर (अध्याय पाँच में-महापरिनिभाना सत्त ) हो सकता हैः जो निम्न प्रकार से पढ़ा जाता है :
‘9 हमें महिलाओं के प्रति अपना आचरण कैसा रखना चाहिए (आनन्द ने
पूछा)
उन्हें न देखना, आनन्द
परन्तु यदि हम उन्हें देखें, तो हमें क्या करना चाहिए?
बात न करना, आनन्द