492 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
ब्रह्मचर्य का अपना सिद्धान्त संरक्षित करने के लिए मूल्यवान है और भिक्षु सम्पादक के लिए इस सिद्धान्त में इसे सम्मिलित करना असंभव नहीं था।
यहाँ दो अन्य विचारणीय विषय हैं जो इस प्रस्ताव का समर्थन करेंगे कि यह अनुच्छेद बाद में सम्मिलित किया गया है।
(1) प्रथमतः इस सुत्त के परिचय में दी गई तालिका (देवी दास द्वारा एस.बी.बी.
शृंखला में, भाग-।। दिघ निकाय के पृष्ठ 72 पर देखा जा सकता है) में यह
देखा जा सकता है कि अनेक उल्लेखनीय उद्धरण जो इस सुत्त में वर्णित
हैं अन्य सुत्तों में भी वर्णित हैं। इस बात पर ध्यान देना महत्त्वपूर्ण है कि यह
उद्धरण किसी अन्य सुत्त में नहीं है यद्यपि वास्तविकता यह है कि इनमें इस
सुत्त के अनेक अन्य उद्धरण हैं।
(2) दूसरा, इस सुत्त के परिचय के पृष्ठ 38 (देवीदास द्वारा एस.बी.बी.ई. के खण्ड
11 में प्रकाशित) में यह उल्लिखित है कि सुत्त का चीनी भाषा में संस्करण
उपलब्ध है। परन्तु इस चीनी संस्करण में भी यह विशिष्ट उद्धरण नहीं है।
हम और अधिक विचार करते हुए संभावना के परीक्षण का प्रयोग करते हं। क्या यहाँ कोई कारण था कि आनन्द ने ऐसा प्रश्न क्यों पूछा क्या यह बुद्ध के महिलाओं के साथ ज्ञात रिश्तों के अनुरूप था? यहाँ यह दर्शाते हुए प्रमाण है कि हो सकता है आनन्द द्वारा ऐसा प्रश्न पूछा नहीं गया और यदि ऐसा प्रश्न पूछा गया होता तो बुद्ध द्वारा ऐसा उत्तर नहीं दिया जा सकता था। पिटाकाओं के उल्लेखों के अनुसार आनन्द एवं बुद्ध का महिलाओं के प्रति आचरण ऐसे प्रश्न पूछने और ऐसा उत्तर दिये जाने की संभावनाओं के विपरीत है।
इस मुद्दे पर कि आनन्द को यह प्रश्न पूछने की कोई जरूरत थी, यहाँ यह नोट करना संगत होगा कि महापरिनिभाना सुत्त के इसी अध्याय में, उपरोक्त उद्धृत से कुछ गाथायें हटा दी गई हैं, बुद्ध वर्णन करते हैं कि आनंद कितना मोहक है और इसे सभी क्यों प्यार करते है। मैं इनमें से निम्नलिखित दो गाथायें उद्धृत करता हूँः
भ्रातृगण, आनन्द में ये चार चमत्कारिक एवं अद्भुत गुण हैं। यदि भिक्षुक संघ के लोग आनन्द के पास आते हैं तो वे उसको निहार कर प्रसन्न हो जाते हैं और तब आनन्द उनको सत्य का उपदेश देता और वह इस वार्तालाप से प्रसन्न हो जाते हैं जब आनन्द मौन होता है तो भिक्षुक व्याकुल हो जाते।