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यदि भिक्षुक संघ की बहनें या सद्-पुरुष या सद्-महिलायें आनन्द से मिलती थीं और तब यदि आनन्द उन्हें सत्यता का उपदेश देते तो वे वार्तालाप से प्रसन्न हो जाते, जब आनन्द मौन होता जो भिक्षुक संघ की बहनें व्याकुल हो जातीं।
इससे यह स्पष्ट होता है कि आनन्द का महिलाओं से मिलना सामान्य बात थी, वह न केवल भिक्षुक संघ की बहनों से मिलते थे बल्कि संघ के अतिरिक्त उनसे मिलने आने वाली सद्-महिलायें, जो संघ की सदस्य नहीं थीं, से भी मिलते थे। वे उनको देखते थे, मिलते थे और बातचीत करते थे। तब आनन्द ने ऐसा प्रश्न क्यों पूछा? बुद्ध जानता था कि महिलायें आनन्द से अक्सर मिलती हैं। उन्होंने पहले कोई आपत्ति नहीं की थी। उसने महिलाओं के साथ सभी संबंधों को निषेधात्मक एवं घृणनीय क्यों समझा? यह पूरा उद्धरण इतना अस्वाभाविक है कि इसे बाद के भिक्षुओं द्वारा सम्मिलित किया गया माना जाना चाहिए।
आनन्द के जीवन में एक और उदाहरण है जो महापरिनिभाना सुत्त के उद्धरण से भिन्न है। जैसाकि हम भली-भाँति जानते हैं कि प्रथम संगीत (परिषद) में आनन्द के विरुद्ध पाँच शिकायतें भी गई थीं। वे थीं :-
(1) कि वह यह पूछने में असफल रहा कि विनय का कौन-सा भाग बुद्ध की राय
में छोटा भाग है जिसके लिए उन्होंने संघ को परिवर्तन एवं संशोधन करने
का अधिकार दिया है;
(2) कि वह एकान्तवास के दौरान महामहिम के चोगे पर, जब सिलाई की जा
रही थी, तेजी से चढ़ गया;
(3) कि उसने मृत महामहिम के पार्थिव शरीर को महिलाओं द्वारा श्रद्धांजलि दी
जाए ताकि मृत शरीर उनके आँसुओं से मलिन हो जाये;
(4) कि उसने महामहिम को चक्र के लिए जीवित रहने के लिए नहीं कहा;
और
(5) कि महिलाओं को संघ में प्रवेश दिलवाने वाले प्रमुख साधक थे, ये सभी
आरोप आनन्द को दोषी प्रतिपादित करते हैं। क्या वे दोषी प्रतिपादित किये
गये या नहीं, यह एक अन्य मामला है। तीसरा आरोप रोचक है। चूँकि इस
का संबंधित प्रश्न के साथ बहुत बड़ा सम्बन्ध है। आनन्द ने महिलाओं को
महामहिम का शरीर छूने की इजाज़त क्यों दी यदि महापरिनिभाना सुत्त ने