106. हिन्दू महिला का उत्थान एवं पतनः इसके लिए जिम्मेवार कौन था? - Page 515

496 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

संदेह या विवाद के लिए कोई स्थान छोड़े बिना सुस्पष्ट उत्तर दिया। उन्होंने कहा कि महिलायें उसका सिद्धान्त एवं उसका अनुशासन समझने के लिए पूरी तरह से सक्षम हैं और परिव्रजा लेने की उनकी माँग को इस कारण से नहीं ठुकराया गया है। इससे यह स्पष्ट है कि बुद्ध ने बुद्धि या आचरण की दृष्टि से महिलाओं को पुरुषों से हीन नहीं माना कि उन्होंने महिलाओं के प्रवेश का विरोध किया क्यों वे उन्हें निम्न दर्जे का मानते थे और उन्हें भय था कि वह संघ की प्रतिष्ठा को कम कर सकती है, के संबंध में तर्क का यहाँ उल्लेख करना उचित नहीं है। इसलिए यदि उनकी ऐसी भावना होती तो उन्होंने कभी भी उनके प्रवेश की स्वीकृति नहीं दी होती।

यह तर्क कि उन्होंने भिक्खुनि संघ का गठन भिक्खू संघ के अधीन किया, इस व्यवस्था के प्रश्न के उत्तर में उल्लिखित है कि उत्कृष्टता या हीनता का कोई विचार नहीं था, इस व्यवस्था का आधार पूर्णतया व्यावहारिकता थी। परिव्रजिका (भिक्षुणी) में महिलाओं के प्रवेश से बुद्ध को दो प्रश्नों का उत्तर देना पड़ता। क्या पुरुषों एवं महिलाओं के लिए केवल एक संघ होना चाहिए? उन्होंने निर्णय लिया कि दो अलग-अलग संघ होने चाहिए। उन्हें भय था कि पुरुषों एवं महिलाओं की मण्डली से ब्रहा्रचर्य का नियम परिव्रजक पूर्णतया समाप्त हो जायेगा। अतः महिलाओं को प्रवेश की स्वीकृति देते समय उन्होंने सोचा, यह आवश्यक है कि उनके शब्दों का प्रयोग किया जाए, कि दो अलग संगठनों के गठन से उनके बीच बाँध बन जायेगा। दो अलग संगठनों के गठन का निर्णय लेने से उन्हें एक और प्रश्न का सामना करना पड़ा। यदि दो अलग संघ होंगे-एक पुरुषों के लिए तथा दूसरा महिलाओं के लिए क्या ये दोनों स्वतंत्र होंगे और अलग-अलग संगठन होंगे या इन दोनों में किसी प्रकार का आन्तरिक संबंध होगा?

प्रथम मामले पर कोई अन्य निर्णय इसके सिवाय संभव नहीं था कि महिलाओं का संघ पुरुषों के संघ से अलग होना चाहिए।

यह एक अपरिहार्य तर्क था जिसका ब्रहा्रचर्य के नियम से अनुसरण किया गया और दोनों पर पूर्णतया लागू है। बुद्ध जानते थे कि पुरुषों एवं महिलाओं दोनों के जीवन में काम प्रवृत्ति कितनी बड़ी ताकत है। बुद्ध के अपने शब्दों के अनुसार यह एक ऐसी प्रवृत्ति है जो पुरुष को महिला की दासता और महिला को पुरुष की दासता की ओर ले जाती है। यदि इस प्रवृत्ति को अपनी पूरी ताकत से पनपने का अवसर दिया जाए तो ब्रह्मचर्य के नियम को बचाने के लिए ही उसने दो अलग संघों का गठन किया है।