106. हिन्दू महिला का उत्थान एवं पतनः इसके लिए जिम्मेवार कौन था? - Page 516

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अब दूसरे मुद्दे पर विचार करते हैं : क्या बुद्ध द्वारा लिए गए निर्णय के अतिरिक्त अन्य कोई निर्णय लिया जा सकता था? जिन महिलाओं ने उसके मत को स्वीकार किया है वह अपरिपक्व महिलायें थीं। उन्हें उसके सिद्धान्त की शिक्षा दी जानी थी और उन्हें उसके अनुशासन के नियमों के अनुसार प्रशिक्षित किया जाना था। इस कार्य को कौन कर सकता था? अपने अतिरिक्त उसने किसको यह कार्य सौंपा? अपने धर्मसंघ के पुरुष भिक्खू के अतिरिक्त किसी अन्य को नही। इसके लिए उन्हें पहले ही अपने सिद्धान्त में शिक्षा तथा अपने अनुशासन में प्रशिक्षित किया जा चुका था और यह है जो उसने किया अब भिक्खुओं को भिक्खुणियों को शिक्षा देने का कार्य सौंप कर भिक्खुओं एवं भिक्खुणियों के मध्य कौन-सा संबंध बनाया गया? यह उठाये जाने वाला आवश्यक प्रश्न था। इसके बिना भिक्खुनी संघ की भिक्खू संघ के प्रति अधीनता का औचित्य स्पष्ट नहीं होता। इस प्रश्न का स्पष्ट उत्तर यह है कि भिक्खुनियों को प्रशिक्षण का कार्य भिक्खुओं को सौंप देनें से उनका आपस में संबंध शिक्षक एवं शिष्य का हो जायेगा। अब शिक्षक एवं शिष्य के संबंध से शिक्षक का शिष्य पर अधिकार हो जाता है तथा शिष्य का शिक्षक के प्रति समर्पण एवं अधीनता का भाव हो जाता है? बुद्ध ने इसके अतिरिक्त और क्या किया?

इस संबंध में यह उपयोगी होगा कि ईसाई चर्च में मठों एवं आश्रमों के मध्य संबंधों की तुलना उपयोगी होगी। क्या आश्रम (नरियाँ) मठों (मनोस्ट्रीज) के अधीन नहीं हैं? निस्संदेह हैं। इसलिए कोई यह कह सकता है कि ईसाईमत में महिलाओं को पुरुषों से हीन माना जाता है? तब बुद्ध द्वारा भिक्खुओं और भिक्खुनियों के मध्य संबंधों को विनियमित करने के लिए की गई व्यवस्था की विभिन्न व्याख्या क्यों की जाती है?

जहाँ तक सुत्त पिट्टक का संबंध है इस आरोप के लिए बिल्कुल कोई आधार नहीं है कि बुद्ध महिलाओं के प्रति भेद-भाव करते थे और पुरुषों को हमेशा उनसे सावधान रहने की नसीहत देते थे।

II.

अब हम बुद्ध का महिलाओं के प्रति रवैये के विशिष्ट उदाहरणां पर विचार करते हैं। क्या बुद्ध महिलाओं को निम्न दर्जे का स्वीकार करते थे? मैं विश्वस्त हूँ कि जो कोई भी बौद्ध धार्मिक साहित्य में बुद्ध द्वारा महिलाओं के संबंध में दिये गये संदर्भों को पढ़ कर प्रभावित होगा कि ऐसा कोई कार्य जिससे महिलायें अपमानित हों, करना