498 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
तो दूर रहा बल्कि बुद्ध ने अपने पूर्ण जीवन में महिलाओं को उन्नत करने तथा उनके नैतिक एवं बौद्धिक उत्थान करने का प्रयास किया है।
सामान्यतया भारत के लोगों द्वारा प्राचीन काल से ही पुत्री के जन्म को विपत्ति के रूप में माना जाता है। क्या बुद्ध ने इस संवेदना में कोई भागीदारी निभाई थी? उसका इस प्रश्न के प्रति रवैया पारम्परिक दृष्टिकोण से भिन्न था। जैसाकि सम्राट प्रसन्नजीत को दिये गये परामर्श से स्पष्ट होता है। एक बार राजा प्रसन्नजीत श्रावास्ती में जीता के उद्यान में बुद्ध से मिलने गये। शाही महल से एक दूत आया और उसने उसे सूचना दी कि उसकी पत्नी रानी मल्लिका ने एक पुत्री को जन्म दिया है। यह समाचार सुनकर राजा के चेहरे का रंग बदल गया और वह उदास व खिन्न दिखाई देने लगे। बुद्ध ने चेहरे पर यह परिवर्तन देखा और उससे इसका कारण पूछा। इस संबंध में जानकारी मिलने के बाद बुद्ध ने कहा, ‘‘दुखी क्यों होते हो? हे, मानवों के महामहिम, एक बेटी के रूप में सन्तान बेटे से बेहतर सिद्ध हो सकती है संभवतः वह बड़ी होकर बुद्धिमान और सद्गुणी बने।........... कालान्तर में उसका पुत्र महान् कार्य करे और बहुत बड़े-बड़े प्रान्तों पर साम्राज्य करे।
इस प्रश्न के उत्तर में कुछ परिवारों का उत्थान होता है और अन्यों का विनाश होता है, बुद्ध ने भिक्खुओं को बताया होगा कि :
किसी परिवार, भिक्षुक द्वारा प्राप्त की गई महानता कभी समाप्त नहीं होती क्योंकि वे, जो एक बार नष्ट हो जाता है, उसकी इच्छा नहीं करते हैं, वे मरम्मत करते हैं और विनाश नहीं करते हैं, वे संयम से खाते और पीते हैं, वे उस महिला या पुरुष को सत्ता सौंपते हैं जो अमर है। कोई भी परिवार इन चार या इनमें से किसी एक कारण से कभी समाप्त नहीं होते।
चाहे जो भी परिवार भिक्षुक हो उन सभी का अन्त होगा क्योंकि वे जो खोते हैं उसे पाने की इच्छा करते हैं, खराब की मरम्मत करते हैं, संयम से खाते-पीते हैं और सद्गुणी महिला या पुरुष को सत्ता में प्रतिष्ठित करते हैं।
कोई भी परिवार हो- उसका इन चारों या इनमें से किसी एक कारण से विनाश होगा। भिक्खुओं को समझाते हुए, बुद्ध ने भिक्षुकों को बताया कि एक राजा ‘‘जो जीवन चक्र चलाता और उसका लक्ष्य चक्रवर्ती (विश्व सम्राट) बनना होता है जब वह इस संसार में अवतरित हुआ तो क्या हुआ-