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‘जब कभी ऐसे सम्राट इस धरती पर अवतरित होते हैं तो इस धरती पर दिखाई देते हैं चक्र, हाथी, घोड़ा, स्वर्ण, महिला, गृह स्वामी और राज्य अधिकारी के रूप में सात रत्न दिखाई देते हैं।
किसी अन्य अवसर पर विश्व में महिलाओं के मूल्य पर बोलते हुए बुद्ध ने कहा था,
‘‘महिला एक सर्वोत्कृष्ट वस्तु है (जैसा कि समालोचक ने संकलित किया है) क्योंकि यह अपरिहार्य उपयोगी इसलिए है कि बोधिसत्व और विश्व के शासक उससे जन्म लेते हैं।’’
एक व्यक्ति जिसकी दृष्टि में पुत्री का जन्म एक दुख का अवसर नहीं हो सकता और खुशी का अवसर हो सकता, जिसका यह दृष्टिकोण है कि जिन परिवारों ने अपने कार्यकलापों के लिए महिला को अधिकृत किया वही परिवार पतन से बचे, जिस व्यक्ति को महिला को सात रत्नों में से एक रत्न कहने में कोई हिचकिचाहट नहीं हुई, उस व्यक्ति को महिला से घृणा करने वाला या उनका तिरस्कारक कैसे कहा जा सकता है? महिला समुदाय के प्रति बुद्ध द्वारा प्रतिपादित विशिष्ट वक्तव्य सामान्य संवेदनाओं से युक्त है। क्या कोई यह कह सकता है कि ये परिकलित किया गया है कि महिला को उपहास का पात्र एवं तिरस्कृत वस्तु बनाया जाए।
III.
जो लोग भिक्खुनियों को भिक्खुओं के अधीन करने को सामाजिक बुराई कहते हैं वे इस बात को नहीं समझते कि बुद्ध ने महिलाओं को संन्यास या परिव्रजा की स्वीकृति देकर कितना बड़ा क्रान्तिकारी कदम उठाया था। ब्राहा्रण सिद्धान्त के अनुसार महिलाओं को पहले से ही ज्ञान प्राप्ति के अधिकार से वंचित किया हुआ था। जब संन्यास का प्रश्न उठा तो उन्होंने भारतीय महिलाओं के प्रति एक और गलत का किया। सन्ंयास उन ब्राहा्रणों के लिए आदर्श नहीं था जो वेदों की उपासना करते थे और काफी समय तक उपनिषद् को धार्मिक साहित्य की मान्यता देने से मना करते रहे। संन्यास उपनिषद् का आदर्श था तथा उपनिषद् का सिद्धान्त आत्मा ही ब्रहा्र है, को समझने पर ही संन्यास का अन्त है। ब्राह्मण संन्यासी जीवन के घोर विरोधी थे। अन्ततः वे कुछ शर्तों के साथ झुके। इनमें से एक शर्त यह थी कि महिलायें (और शूद्र) संन्यास के पात्र नहीं होंगे। इस कारण को समझना बहुत ही महत्त्वपूर्ण है कि ब्राहा्रणों ने महिलाओं को संन्यास ग्रहण करने से रोक क्यों लगा रखी थी क्योंकि इससे ब्राहा्रणों का महिलाओं के प्रति रवैया समझने में सहायता मिलती है और यह