106. हिन्दू महिला का उत्थान एवं पतनः इसके लिए जिम्मेवार कौन था? - Page 519

500 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

रवैया बुद्ध के रवैये से बिल्कुल भिन्न है। मनु द्वारा कारण वर्णित किया गया है। इसे निम्न प्रकार से पढ़ा जाए :

IX .18 महिलाओं को वेद पढ़ने का कोई अधिकार नहीं है। इसलिए उनके संस्कार बिना वेद-मन्त्र पढ़े किये जाते हैं। महिलाओं को धर्म की कोई जानकारी नहीं है क्योंकि उन्हें वेदों की जानकारी प्राप्त करने का कोई अधिकार नहीं है। वेद-मन्त्रों का उच्चारण पापों के नाश के लिए उपयोगी है। चूँकि महिलायें असत्य हैं वे वेद-मंत्रों का उच्चारण नहीं कर सकती।

यद्यपि बुद्ध की अपेक्षा मनु परवर्ती था उसने प्राचीन धर्म सूत्र में प्रतिपादित पुराने दृष्टिकोण को उद्घाटित किया। महिलाओं के प्रति यह दृष्टिकोण भारत की महिलाओं का तिरस्कार एवं उनके प्रति अन्याय था। यह अन्याय था क्योंकि बिना किसी औचित्य के उन्हें ज्ञान अर्जित करने के अधिकार से वंचित किया गया जो कि प्रत्येक मानव का जन्मसिद्ध अधिकार था। यह तिरस्कार इसलिए था क्योंकि उन्हें ज्ञान अर्जन के अवसर से वंचित करने के पश्चात् उन्हें ज्ञान के लिए असत्य जैसा मलिन घोषित कर दिया गया था और इसलिए उन्हें संन्यास ग्रहण करने की स्वीकृति न दी जाए क्योंकि संन्यास को ब्रहा्र के पास पहुँचने का मार्ग बताया गया है। उन्हें न केवल अपनी आध्यात्मिक क्षमता प्राप्त करने से वंचित किया गया बल्कि उन्हें ब्राह्मणों द्वारा किसी आध्यात्मिक क्षमता प्रापत करने के अयोग्य घोषित किया गया था।

यह महिलाओं के प्रति निर्दयी व्यवहार है। इसकी कोई समानता नहीं है, जैसाकि प्रो. मैक्समूलर ने कहा है, ‘‘मानव ईश्वर से बहुत दूर हो सकता है परन्तु धरती पर मनुष्य से अधिक ईश्वर के समीप कोई नहीं है, धरती पर ईश्वर के समान मनुष्य के सिवाय और कोई नहीं है’’ यदि यह पुरुष के लिए सत्य है तो यह महिला के लिए सत्य क्यों नहीं है। ब्राहा्रणों के पास कोई उत्तर नहीं है।

परिव्रजि़का जीवन में महिलाओं के प्रवेश द्वारा, बुद्ध ने एक ही बार में इन दोनों बुराइयों को समाप्त कर दिया। उन्होंने उन्हें ज्ञान का अधिकार तथा पुरुषों के साथ-साथ अपनी आध्यात्मिक क्षमताओं को समझने का भी अधिकार दिया। यह एक क्रान्ति एवं भारत में महिलाओं को स्वतंत्रता दोनों थे, प्रो. मैक्समूलर के शब्दों में उद्धरण इस प्रकार है :

‘‘भारत का इतिहास हमें पढ़ाता है कि पुराने ब्राहा्रणवादी कानून के पीडि़त करने वाले बन्धक अन्ततः टूट गये, इसमें बिल्कुल भी सन्देह है कि हमें बौद्ध-धर्म को