106. हिन्दू महिला का उत्थान एवं पतनः इसके लिए जिम्मेवार कौन था? - Page 521

502 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

की जिनके साथ उसने सभी चीज़ों को उनके वास्तविक रूप से देखने की शक्ति प्राप्त की थी, इस शक्ति को बुद्ध ने चेतना कहा है।

एक मिक्खुनी सोमा ने कहा कि हमारे आर्यस् के अनुसार महिला की प्रकृति हमारे लिए अड़चन बन सकती है;

‘‘वह एक व्यक्ति में क्या हो सकता है जो दूसरे के लिए महत्त्वपूर्ण हो उनकी अन्तर्रात्मा में जीवन के नियम वास्तव में समाविष्ट है?

एक का प्रश्न दूसरे के लिए कैसे उत्पन्न होता है

क्या मैं उन मामलों में एक महिला हूँ या

क्या मैं एक पुरुष हूँ? या मैं क्या नहीं हूँ तब?

इस प्रकार मैं संन्यासी हूँ और वार्तालाप के लिए उपयुक्त हूँ’’।

सब कुछ ऐसा नहीं है। बुद्ध द्वारा और महिलाओं को भिक्खुनी बनने की स्वीकृति देने से उन्होंने उनका पुरुष के साथ समानता का मार्ग प्रशस्त कर दिया है। श्रीमती रायस् डेविड द्वारा अवलोकित के अनुसार ‘‘यह सत्य है कि भिक्खुनियों को तकनीकी रूप से सदैव के लिए भिक्खुओं के अधीन कर दिया गया है। समान रूप से यह स्पष्ट है कि बौद्धिकता एवं अधिक प्रतिष्ठा द्वारा थेरी मित्रतावश समानता प्राप्त कर सकते हैं। सालम्स XXX, VII में एक उदाहरण है जिसमें बुद्ध ने आध्यात्मिकता प्राप्त करने के लिए अपने आपको महान् कासापा, जो मठ के प्रमुख के उत्तराधिकारी के रूप में संस्थापक के साथ अपने आपको जोड़ा। इस संबंध में यह नोट किया जाये कि बुद्ध ने इस प्रकार कौमार्यता पर कोई पुरस्कार नहीं नियत किया था। उन्होंने अपना मार्ग सभी वर्गों-विवाहित, अविवाहित, विधवाओं और वेश्याओं के लिए भी खुले रखे। सभी पुरुषों के साथ वरीयता, स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा एवं समानता प्राप्त कर सकते थे।

IV.

इसमें कोई सन्देह नहीं हो सकता कि भारत में महिलाओं की स्थिति, जो कभी होती थी, में लगातार गिरावट आई है। कोई भी इस संबंध में अधिक नहीं बता सकता कि प्राचीन समय में उन्होंने राजनीतिज्ञता में कितनी या कैसी भूमिका निभाई है। परन्तु इसमें कोई संदेह नहीं है कि वे देश के बौद्धिक एवं सामाजिक जीवन में