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बहुत ही उच्च पदों पर आसीन रही होंगी।
अथर्ववेद से स्पष्ट है कि एक समय था जब स्त्री उपनयन की हकदार थी। जब एक लड़की अपना ब्रह्मचर्य समाप्त कर लेती तो उसे विवाहयोग्य कहा जाता था। श्रुत-सूत्र से यह स्पष्ट है कि महिलायें वेद-मंत्रों का उच्चारण कर सकती थीं और महिलाओं को वेदन पढ़ना सिखाया जाता था। इस तथ्य का प्रमाण पाणिनी अष्टाध्यायी में दिया गया है कि महिलायें गुरुकुल में जाती थीं और वेद की विभिन्न शाखाओं का अध्ययन करती थीं और मीमांसा में पारंगत हो जाती थी। पातंजलि महाभाष्य में दर्शया गया है कि महिलायें अध्यापक थीं और छात्राओं को वेद पढ़ाती थीं। महिलायें पुरुषों के साथ धर्म, दार्शनिकता और अध्यात्म विद्या के अत्याधिक जटिल विषयों पर सार्वजनिक रूप से विचार-विमर्श की कहानियाँ किसी रूप में कम नहीं हैं। जनक एवं सुलभ, यज्ञवाल्क्य और गार्गी, यज्ञवाल्क्य और मैत्रेयी तथा शंकराचार्य एवं विद्याधारी के बीच सार्वजनिक वाद-विवाद इस बात को दर्शाता है कि मनु से पूर्व समय में भारतीय महिला ज्ञान और शिक्षा के उच्चतम शिखर तक पहुँच सकती थी।
इस बात पर कोई विवाद नहीं हो सकता कि किसी समय महिलाओं को बहुत अधिक सम्मान दिया जाता था। प्राचीन भारत में रतनियों में से जो राजा के अभिषेक में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती थी वह रानी होती थी और राजा उसको अन्यों की भाँति उपहार दिया करते थे। राजा केवल इस पर चुनी गई रानी का ही सम्मान नहीं करते थे बल्कि निम्न जातियों की अपनी अन्य पत्नियों का भी पूरा सम्मान करते थे। इसी प्रकार राज्यअभिषेक समारोह के पश्चात् श्रेणी की मुखिया महिलाओं को भी अभिवादन करते थे।
विश्व के किसी भी भाग की तुलना में भारत में महिलाओं का स्थान बहुत ऊँचा था। उनकी गिरावट के लिए कौन जिम्मेदार था? हिन्दुओं को कानून देने वाला मनु था। इसका कोई और उत्तर नहीं हो सकता। इस संदेह में कोई गुंजाइश न रहे, इसलिए महिलाओं के संबंध में मनु द्वारा बनाये गये कानून उद्धृत करता हूँ और इनको मनु-स्मृति में देखा जा सकता है।
II. 213. इस (संसार) में महिलाओं का स्वभाव है कि पुरुष को पथभ्रष्ट करें। इस कारण विवेकी पुरुष कभी भी महिलाओं (सहचर्य) के साथ अरक्षित नहीं है।
II. 214. महिलायें (इस) संसार को भ्रमित करने में समर्थ हैं, न केवल मूर्ख परन्तु ज्ञानी पुरुष भी भ्रमित हो सकते हैं और उन्हें अपनी कामना और दोष का दास (बना) कर सकती है।