504 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
II. 215. किसी को एकान्त स्थान पर अपनी माता, बहन या पुत्री के साथ नहीं बैठना चाहिए क्योंकि इन्द्रियाँ बलवान् होती हैं और ज्ञानी पुरुष को भी अपने वशीभूत कर लेती हैं।
ix. 14. महिलायें सौन्दर्य की परवाह नहीं करती और न ही उनका ध्यान आयु पर केन्द्रित होता है (चिंतन) (यह पर्याप्त है कि) वह एक पुरुष है, वे अपना समर्पण सुन्दर को तथा कुरूप को भी कर देती हैं।
ix. 15. उनके पुरुषों के प्रति मनोवेग से, अपने चंचल स्वभाव, स्वाभाविक निष्ठुरता से वे अपने पतियों के प्रति भी बेवफा हो जाती हैं लेकिन उन्हें इस (संसार) में सावधानीपूर्वक नियंत्रित किया जा सकता है।
ix. 16. उनकी मनोवृति को जानते हुए, जो उनके सृजन के समय प्राणियों के सृजक ने उनमें भरी थी, (प्रत्येक) पुरुष को उनको रक्षित करने के लिए अत्यधिक कर्मठता से प्रयास करने होंगे।
ix. 17. (उनका सृजन करते समय) मनु ने महिलाओं को आसन (उनका मनपसंद) और आभूषण, मलिन कामना, कोप, छलकपट, द्वेष और बुरे आचरण आवंटित किये हैं।
यह दर्शाता है कि मनु की राय में महिला कितनी गिरी हुई थी। महिलाओं के विरुद्ध मनु के नियम इस दृष्टिकोण के साथ दृष्टान्त रूप में हैं।
महिलायें किसी भी परिस्थिति में स्वतंत्र नहीं हो सकती है। मनु की राय मेंः-
ix. 2. रात-दिन महिलायें अपने (परिवारों) (के) पुरुषों के अधीन होनी चाहिए और यदि वे अपने आप को इन्द्रियजन्य सुखों से जोड़ लेती है तो उन्हें किसी एक के नियंत्रण में रखा जाए।
ix. 3. उसका पिता बचपन में (उसका) नियंत्रण करेगा, युवा अवस्था में पति (उसका) नियंत्रण करेगा, वृद्ध अवस्था में उसके बेटे (उसका) नियंत्रण करेंगे, एक महिला कभी भी स्वतंत्र नहीं है।
ix. 5. महिलाओं को विशेषकर दुष्प्रवृत्तियों की माह चाहे देखने में वे कितनी भी तुच्छ हो, के प्रति सावधान किया जाए, यदि उन्हें सावधान न किया गया तो वे दोनों परिवारों के लिए मुसीबत खड़ी कर सकती हैं।
ix. 6. सभी जातियों का गुरुतर दायित्व समझते हुए, कमजोर पति (अवश्य) भी अपनी पत्नियों को रक्षित करने का प्रयास करे।