106. हिन्दू महिला का उत्थान एवं पतनः इसके लिए जिम्मेवार कौन था? - Page 524

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v. 147. अपने स्वयं के निजी घर में भी एक लड़की द्वारा, एक युवा महिला द्वारा या वृद्ध महिला द्वारा स्वतंत्र रूप से कुछ न किया जाये।

v. 148. बचपन में लड़की को अपने पिता के, युवावस्था में अपने पति के, जब उसके पति की मृत्यु हो जाये तो अपने पुत्र के नियन्त्रण में रहना चाहिए; महिला कभी भी स्वतंत्र नहीं होनी चाहिए।

v. 149. वह अपने पिता, पति या बच्चों से अलग होने की इच्छा न करे, उनको छोड़ने से वह दोनों (अपने स्वयं और अपने पति के) परिवारों को निन्दनीय करेगी।

महिला को तलाक लेने का अधिकार नहीं है।

v. 45. पति को पत्नी के साथ एक माना जाये इसका अर्थ है कि महिला एक बार विवाहित हो जाने के बाद अलग नहीं हो सकती।

अनेक हिन्दू यहाँ रुक जाते हैं क्योंकि यह सम्पूर्ण कहानी मनु के तलाक के कानून की है और अपनी अन्तर्रात्मा को सांत्वना द्वारा इसका सम्मान इस सोच के साथ करते हैं कि मनु ने विवाह को पवित्र बंधन माना है और इसलिए तलाक की भी स्वीकृति नहीं दी है। निस्संदेह यह सच्चाई से कोसों दूर है। उसने तलाक के कानून का बिल्कुल भिन्न उद्देश्य रखा है। यह पुरुष को महिला के साथ बाँधने के लिए नहीं था परन्तु यह महिला को पुरुष के साथ बाँधने के लिए था तथा पुरुष को आजाद रखना था।

मनु ने पुरुष को अपनी पत्नी का परित्याग करने से नहीं रोका है। वास्तव में उसने उसे अपनी पत्नी के परित्याग की ही स्वीकृति नहीं दी बल्कि उसने उसको बेचने की भी स्वीकृति दी है। परन्तु उसने पत्नी को स्वतंत्र होने से रोका है। देखें मनु ने कहा है :-

ix. 46. न तो बिक्री और न ही विवाह-विच्छेद द्वारा पत्नी अपने पति से मुक्त हो सकती है।

इसका अर्थ यह है कि एक पत्नी बिक्री या उसके पति द्वारा विवाह-विच्छेद करने पर वह किसी की भी कानूनी धर्मसंगत पत्नी नहीं बन सकती चाहे उसे संबंध- विच्छेद पर खरीद कर प्राप्त किया गया है। यदि यह सरासर गलत या न्यायविरुद्ध नहीं है तो कुछ भी गलत या न्याय विरुद्ध नहीं हो सकता।