506 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
परन्तु मनु अपने कानून बनाते समय न्याय या अन्याय की सोच से चिन्तित नहीं था। वह महिलाओं को स्वतंत्रता से वंचित करना चाहता था जो उनके पास बौद्ध शासन में थी। मनु इस स्वतंत्रता को नहीं चाहता था और इसे रोकने के लिए महिलाओं को उनकी स्वतंत्रता से वंचित कर दिया गया।
सम्पत्ति के मामले में मनु ने पत्नी के दर्जे को कम कर दास बना दिया।
ix. 146. एक पत्नी, एक पुत्र और एक दास, इन तीनों की कोई सम्पत्ति नहीं होगी, सम्पदा जो वे अर्जित करेंगे उसकी होगी जिससे वे संबंधित हैं।
जब वह विधवा हो जायेगी, मनु उसे आजीविका की स्वीकृति देते हैं यदि उसका पति संयुक्त था, और उसके (पति) परिवार से अलग थी तो उसके पति की सम्पत्ति से जायदाद की स्वीकृति दी है। परन्तु मनु ने कभी भी सम्पत्ति पर किसी प्रकार के अधिकार की स्वीकृति प्रदान नहीं की है।
मनु के कानूनों के अधीन महिला दैहिक सज़ा की पात्र है और मनु पति को अपनी पत्नी की पीटने की स्वीकृति देते हैं :
VIII. 299. पत्नी, पुत्र, दास, शिष्य और सगा छोटा भाई, जिसने गलती की हो, को रस्सी या बेंत से पीटा जा सकता है। मनु के मतानुसार महिला को ज्ञान का अधिकार नहीं है। मनु ने उसके लिए वेद अध्ययन वर्जित किया है।
II. 66. महिला के लिए भी संस्कारों का निष्पादन आवश्यक है और यह संस्कार बिना वेद-मंत्रों के उच्चारण के निष्पादित किये जाएँ।
ब्राहा्रणवाद के अनुसार यज्ञ व दान धर्म की आत्मा होते हैं। मनु यज्ञ करने के लिए महिलाओं को रोकते हैं। मनु निर्दिष्ट करते हैं कि :
ix. 36-37. वेदों द्वारा नियत दैनिक यज्ञ महिला द्वारा न किया जाये। यदि वह ऐसा करती है तो वह नरक में जाएगी।
उन्हें ऐसे यज्ञ करने में असमर्थ बनाने के लिए मनु उन्हें ब्राहा्रण पुरोहितों से सहायता एवं उनकी सेवायें प्राप्त करने से रोकते हैं।
महिलाओं द्वारा किये यज्ञ में ब्राहा्रण कभी भोजन न करें। महिलाओं द्वारा किये गये यज्ञ अशुभ होते हैं और ईश्वर को स्वीकार्य नहीं है। अतः इनसे बचना चाहिए।