106. हिन्दू महिला का उत्थान एवं पतनः इसके लिए जिम्मेवार कौन था? - Page 526

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अन्ततः जीवन के आदर्श के संबंध में मनु ने महिला से कुछ कहा है। यह उपयुक्त होगा कि उन्हीं के शब्दों का उल्लेख किया जाए :

v. 151. उसे जिस किसी को उसके पिता द्वारा या पिता की स्वीकृति से उसके भाई द्वारा सौंपा जाता है, वह जब तक जीवित रहेगी तब तक उसकी आज्ञा का पालन करेगी और जब पति की मृत्यु हो जाए, तो वह उसकी स्मृति को धूमिल नहीं करेगी।

v. 154. यद्यपि पति सदगुण विहीन या कहीं और भोग-विलास कर रहा हो या अच्छे गुणों से रहित हो तो भी निष्ठावान् पत्नी की भांति पति का ईश्वर के रूप मं हमेशा सम्मान करे।

v. 155. अपने पति से अलग महिला द्वारा कोई यज्ञ, कोई व्रत, कोई उपवास न किया जाये, यदि एक पत्नी अपने पति की आज्ञा का पालन करती है तो केवल इसी कारण से उसे स्वर्ग की प्राप्ति होगी।

अब वह संगत पाठ प्रस्तुत है जो मनु द्वारा महिलाओं के लिए नियत आदर्शों का महत्त्वपूर्ण अंश है :-

v. 153. पति जो उससे पवित्र मंत्रों के साथ विवाह करता है, वह अपनी पत्नी का हमेशा खुशी का स्रोत इस जन्म तथा आगामी जीवन में भी बना रहेगा।

v. 150. वह अपने घरेलू कार्यों का प्रबंधन हमेशा तत्परता, खुशी व कुशलता से करे व अपने बर्तनों को धोने में सावधान एवं खर्चे में मितव्ययी रहे।

इसे हिंदू महिलाओं के लिए अत्यधिक उच्च आदर्श मानते हैं।

महिलाओं की असमर्थताओं रूपी इमारत की मुंडेर पर विशिष्ट प्रकार का पत्थर लगाते हुए मनु ने नया नियम घोषित किया कि महिला की हत्या केवल एक उपपातक अर्थात् यह एक लघु अपराध था।

xi. 167. मद्य, महिला, शूद्र, वेश्य या क्षत्रिय को मारना तथा आस्तिकता (यह सभी) लघु अपराध है।

हर कोई आसानी से समझ सकता है कि शूद्र, वेश्य या क्षत्रिय की हत्या को केवल एक उपपातक क्यों कहा होगा? वह यह स्थापित करना चाहते थे कि ब्राहा्रण