522 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
सुझाव दिया गया है कि महारों ने राजपूतों के ‘कुल’ को अभी हाल ही में हस्तगत अपनी सामाजिक स्थिति में सुधार लाने के लिए किया है। यह स्पष्टतया गलती है। महारों की यह लम्बी परम्परा रही है कि वह ‘सोमावंश’ से संबंधित हैं, जो कि क्षत्रियों की दो शाखाओं में से एक है और महारों के ये गोत्र काफी प्राचीन समय से हैं और इनको हाल ही में हस्तगत नहीं किया गया है, यह इस तथ्य से स्पष्ट है कि जब तक सतारा के अन्तिम मराठा राजा प्रतापसिंह की हैसियत की ब्राह्मणों द्वारा जाँच नहीं कर ली गई तब तक ब्राह्मण उन्हें क्षत्रिय मानने से इन्कार करते थे। ब्राह्मणों का एक दल, जो प्रतापसिंह का पक्ष लेता था, ने तर्क दिया कि भौंसले कुल राजपूतों के 96 कुलों में से एक था और चूंकि राजपूत क्षत्रिय माने जाते थे, इसलिए प्रताप सिंह को क्षेत्रिय के रूप में माना जाना चाहिए। इस आशय के उत्तर में दूसरे पक्ष ने इसे एक पहेली बना दिया। उनका कहना था कि यदि यह तर्क ठोस था तो सभी महारों को क्षत्रिय कहा जाए क्योंकि राजपूतों की तरह उनके भी ‘कुल’ थे। परीक्षण के रूप में ‘कुल’ की वैधता के अतिरिक्त वास्तविकता यह है कि महारों द्वारा कुल को हस्तगत करने की घटना कोई नयी नहीं है। इस मत के समर्थन में यह एक विचार है कि महार मूल नागरिक नहीं है।
इस मत के समर्थन में दूसरा विचार यह है कि सम्मान/आदर के लिए प्रयोग किया जाने वाला शब्द महारों के लिए अलग है। महार सम्मान के लिए जोहर शब्द का प्रयोग करते हैं। यह शब्द निश्चित रूप से संस्कृत के शबद ‘योधार’ का बिगड़ा रूप है। यह सर्व-विदित है कि प्राचीन वैदिक काल में ब्राह्मणों एवं क्षत्रियों ने सम्मान के लिए अलग-अलग शब्दों का चुनाव किया हुआ था। ब्राह्मण ‘नमस्कार’ और क्षत्रिय ‘योधार’ शब्द का प्रयोग करते थे। यह स्वीकार करना कठिन है कि महारों को शब्द ‘योधार’ का प्रयोग करने की स्वीकृति दी गई होगी क्योंकि वे एक निम्न जाति का सम्प्रदाय था या वे विशेष रूप से मूल नागरिक होंगे क्योंकि चमारों एवं मांगों में सम्मान के शब्दों में काफी अन्तर है और क्षत्रियों की हैसियत के अनुसार दूर-दूर तक का कोई संबंध नहीं है। मांग ‘फरमान’ शब्द का प्रयोग करते थे ऐसा प्रतीत होता है यह ‘फरमान’ अर्थात् नियन्त्रण का बिगड़ा रूप है।
चमार ‘डफेरा’ शब्द का प्रयोग करते हैं जिसकी उत्पत्ति के संबंध मैं बताने में असमर्थ हूँ परन्तु ‘वास्तविकता यह रही होगी कि केवल महार जाति के लोग ‘जोहर’ शब्द को सम्मानजनक शब्द के रूप में प्रयोग करते हैं जिसके संबंध में मैंने पहले ही उल्लेख किया है कि इस शब्द का केवल क्षत्रियों द्वारा सम्मानसूचक शब्द के रूप में प्रयोग किया जाता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि मराठा भी एक समय ‘जोहर’ शब्द का प्रयोग सम्मानसूचक शब्द के रूप में प्रयोग करते थे। यह शिवाजी के शासन में