523
भी प्रयोग में था और शिवाजी ने भी अपने हाथ से हस्ताक्षरित किये गये मालोजी घोरपड़े को सम्बोधित पत्र में सम्मानजनक शब्द के रूप में ‘जोहर’ शब्द का प्रयोग किया है। यह भली-भाँति विदित है कि मराठों ने शिवाजी के पश्चात् सम्मानजनक शब्द के रूप में ‘जोहर’ के स्थान पर राम-राम का प्रयोग करना प्रारम्भ कर दिया था। यह आश्चर्यजनक बात है कि महारों ने इस व्यवहार का अनुसरण नहीं किया था। महारों ने जोहर शब्द का प्रयोग जारी रखा जबकि मराठों ने इसे छोड़ दिया था और राज्य ने अन्य सभी के लिए ‘राम-राम’ शब्द लागू कर दिया था, यह एक ऐसा प्रश्न है जिसपर कुछ व्याख्या करने की आवश्यकता है। परन्तु वास्तविकता यह है कि ‘जोहर’ क्षत्रिय के दर्जे का संकेतात्मक शब्द है।
यहाँ एक और मामला है जिसपर ध्यान दिये जाने की आवश्यकता है क्योंकि यह इस विचार के प्रतिकूल है जिसका मैं समर्थन करता हूँ कि महार मूल निवासी नहीं थे और वे वास्तव में मराठा जाति से संबंधित हैं और किसी समय उनको क्षत्रिय के रुप में माना जाता था। वास्तविकता यह है कि महारों में शव को दफनाने की परम्परा है जब कि मराठों एवं क्षत्रियों में सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक रूप से शव का दाह-संस्कार करने की परम्परा है। शव को दफनाने की परम्परा को स्वीकार किया जाना चाहिए परन्तु परम्परा की विद्यमानता को स्वीकार करना निष्कर्ष के स्वरूप को स्वीकार न करना है जबकि निष्कर्ष उससे अद्भूत किया जाना है। प्रथम स्थान में यह संकेत है कि यह शव को दफनाने की परम्परा मौलिक नहीं है। परन्तु महारों में मूल परम्परा शव का दाह संस्कार करना इस तथ्य से समर्थित प्रतीत होता है जबकि महार शव को दफनाते हैं और वे अभी भी अपने साथ शव के साथ मिट्टी के बर्तन में कोयला और अंगार क्रबिस्तान में ले जाते हैं।
ऐसा करने के पीछे कोई उद्देश्य अवश्य होगा और यहाँ कोई भी विचारणीय उद्देश्य सिवाय इसके नहीं हो सकता कि आग का प्रयोग शव के दाह संस्कार के लिए किया जाए। महारों में शव के दाहसंस्कार की परम्परा को किस ने शव को दफनाने की परम्परा में बदल दिया, इस का निश्चित कारण बताना कठिन है। परन्तु ऐसा लगता है कि शव को दफनाना एक परम्परा थी जो बाद में जब महार का दर्जा गिर कर कम हो गया तथा उन्हें अस्पृश्य के रूप में वर्गीकृत किया है तब यह परम्परा महारों पर लागू की गई। परम-पुराण में इस दृष्टिकोण के लिए पर्याप्त समर्थन मिलता है। परम-पुराण में यह उल्लिखित है कि अनेक सम्प्रदायों को उनके शवों के दाह संस्कार में रोक दिया गया था क्योंकि शव का दाह-संस्कार करने का अधिकार तीन पुनरुद्धारित वर्गों को था। यदि यह सही है तो शव को दफनाने की परम्परा प्रभावित करने वाले प्रमाण को नज़र अंदाज नहीं कर सकते जो हमेशा