109. दी महारोंः वे कौन थे तथा वे कैसे अस्पृश्य बने? - Page 546

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लोग रहते हैं जिनको बोयर्स कहा जाता है। बोयर्स खण्डित कबीले के शेष लोग हैं जिनको गाँव के मुखिया द्वारा अपने अधीन कार्य करने तथा समुदाय संरक्षण के हित में लाया गया था। बिल्कुल इसी प्रकार का घटनाक्रम गवेली नाम से ज्ञात बेल्स गाँवों में हुआ है। प्रत्येक गवेली गाँव की सीमा में अजनबियों का समूह है। उन्हें अलतुद कहा जाता था। वे भी गवेली के मुखिया द्वारा गवेली के संरक्षण के लिए लाये गये खण्डित कबीले के हिस्से थे। मेरी समझ में प्रश्न का यही सन्तोषजनक उत्तर है। लेकिन यह प्रश्न रह जाता है कि माहर एक अलग समुदाय के रूप में क्यों रहते रहे जबकि आयरलैंड और वेल्स में अलतुद और बोयर्स ने भिन्न समुदायों के रूप में रहना छोड़ दिया था और ग्रामीण जनसंख्या के सामान्य लोगों के साथ घुल-मिल गये थे। इस प्रश्न का उत्तर कठिन नहीं है। यह ऐसा है कि जाति प्रथा और अस्पृश्यता के विकास ने इनके विलयन को रोक दिया। परन्तु इसे निस्संदेह तीसरे और अन्तिम प्रश्न, जो कि इस लेख में विचार के लिए उठाया गया है, की पूर्व प्रत्याशा में उठा दिया गया है।

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माहरों को अस्पृश्य के रूप में क्यों वर्गीकृत किया गया? ब्राह्मणवाद का बौद्ध धर्म के विरुद्ध संघर्षों में अस्पृश्यता को उद्भव इच्छित किया गया था। यह प्रश्न का विचित्र उत्तर है परन्तु इसमें कोई संदेह नहीं कि यह सही उत्तर है। मामले को स्पष्ट करने के लिए बौद्ध धर्म के सिद्धान्तों को स्पष्ट करना आवश्यक है। सभी विवरणों पर विचार करना आवश्यक नहीं है। यह उल्लेख करना पर्याप्त होगा कि बुद्ध ने जिस बात का सख्ती से विरोध किया है वह ‘यज्ञना’ जो कि आर्य धर्म का मुख्य एवं प्रमुख किस्म थी। यज्ञना में गाय की बलि दी जाती थी।

आर्य अर्थव्यवस्था में गाय अत्यधिक महत्त्वपूर्ण पशु थीं। कृषि की सम्पूर्ण व्यवस्था गाय पर निर्भर करती थी। गाय दूध देती थी जो लोगों की आजीविका का मुख्य साधन था और गाय बैल को जन्म देती थी जो भूमि को जोतने के लिए आवश्यक पशुओं में से थे। यद्यपि बुद्ध की यज्ञना के प्रति आपत्तियाँ दार्शनिकता पर आधारित हैं लेकिन जन-समुदाय की मानसिक सोच बौद्ध धर्म द्वारा संग्रहित जीवन की वास्तविकता से परे नहीं थी क्योंकि वे समझ सकते थे कि गायों के निरन्तर हो रहे वध को रोकना आवश्यक है, जबकि ब्राह्मण गाय को बलि के रूप में प्रयोग करते थे। अतः गाय पहला विचारणीय विषय बन गया और अन्ततः पूजनीय बन गई। लोगां द्वारा गाय की बलि के लिए मना करने पर ब्राह्मणों का आधिपत्य खतरे में पड़ जाने से उनको कोई अन्य तरीका ढूंढना पड़ा जिससे उस जन समुदाय का दिल जीता