528 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
जा सके जिसका झुकाव बौद्ध धर्म की ओर हो गया था। ब्राह्मणों ने ऐसा कैसे किया? बौद्ध धर्म द्वारा गाय की पूजा का प्रभाव लोगों के मन में इतना गहरा पड़ा कि ब्राह्मणों को अपना यज्ञना छोड़ने के सिवाय अन्य कोई रास्ता नहीं दिखाई दिया और उन्होंने बौद्धों की तरह गाय का सम्मान ही नहीं बल्कि उसकी पूजा करना भी प्रारम्भ कर दिया। परन्तु यह पर्याप्त नहीं था। ब्राह्मण अपने बौद्ध धर्म के विरुद्ध संघर्षों में धार्मिक विचारों के किसी सदाचारी विचार से प्रेरित नहीं हुए थे। वे केवल जन समुदाय पर उनका अधिकार एवं प्रतिष्ठा जो बौद्ध धर्म के भिक्खुओं ने हस्तगत कर ली थी, को वापिस प्राप्त करने के राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित थे। वे जानते थे कि यदि वे बौद्धों से किसी प्रकार का वर्चस्व प्राप्त कर लेते हैं तो वे बौद्धों से एक कदम आगे बढ़ जायेंगे और उन्होंने यह नियम लागू कर दिया कि वे न केवल गाय का अपितु किसी पशु या किसी जीवित प्राणी की हत्या नहीं करेंगे। ब्राह्मणों में प्रचलित शाकाहारवाद का उद्भव पूर्व के ब्राह्मणों की कूटनीति का ही परिणाम है जो उन्होंने बौद्धों पर अपना आधिपत्य जमाने के लिए अपनायी थी।
इसके अतिरिक्त एक बात और मस्तिष्क में रखने योग्य है। बौद्ध काल से पूर्व और अशोक के समय तक गाय का माँस सभी वर्गों-ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों और शूद्रों के लिए सामान्य भोजन था। इसमें कोई दुराग्रह नहीं था। गाय एक ऐसा पशु माना जाता था जैसे भेड़ या बकरी या हिरण को माना जाता है। परिणामस्वरूप यद्यपि जनसंख्या चार वर्गों में बंट गई थी परन्तु ये वर्ग भोजन के मामले में अलग नहीं थे और विशेष कर गाय के माँस के संबंध में। संभवतः अन्तर केवल इतना था कि कुछ लोग वध किये गये पशु का माँस खाते थे। यह उनके लिए संभव था जिनकी
खरीदने की हैसियत थी। शेष जो गरीब थे वे मृत पशुओं का माँस खाते थे क्योंकि सम्पन्न लोग भी इसको भोजन के रूप में प्रयोग करने से परहेज नहीं करते थे। यह भी पूर्णतया स्वीकार्य है कि गाँव का मुखिया मृत गायों और पशुओं का माँस खण्डित कबीलों के लोगों जो गाँव की सीमा पर रह रहे थे, को स्थापित समुदाय की सेवा करने के बदले पारिश्रमिक के रूप में दे देते थे। सच्चाई में बिना किसी हेर-फेर के हर कोई यह कह सकता है कि अशोक के राज्यकाल से पूर्व जहाँ तक गाय के माँस को खाने का संबध है इसमें किसी प्रकार का कोई अन्तर नहीं था। सभी गाय का माँस खाते थे। केवल अन्तर इतना था कि गाँव के लोग वध की गई गाय का माँस खाते थे और जो गाँव से बाहर रहते थे वह मृत गाय का माँस खाते थे। इस अन्तर में कोई धार्मिक या सामाजिक महत्त्व नहीं था। यह केवल अमीरी व गरीबी का अन्तर था। बौद्ध काल के पश्चात् और विशेष कर अशोक के समय में एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुआ। गौ-हत्या स्वेच्छा से या राज्य द्वारा बन्द करवा दी गई।