109. दी महारोंः वे कौन थे तथा वे कैसे अस्पृश्य बने? - Page 549

530 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

का बिगड़ा रूप है। मृत आहार का अर्थ जो मृत पशु के माँस पर जीवित है। यह अस्पृश्यता के उद्भव के प्रश्न पर उपरोक्त तर्कों में उल्लिखित के अनुरूप है। परन्तु इस संबंध में दो अन्य पूरक प्रश्न उत्पन्न होते हैं। पहला यह कि उनको कोई विशिष्ट दर्जा देने के लिए विशेषकर महार के जीवन क्रम को क्यों चुना गया। इसका उत्तर पहले ही दिया जा चुका है परन्तु यह यहाँ सारांश रूप में प्रस्तुत हैं क्योंकि इससे महार शब्द के उद्भव की शुद्धता सशक्त होगी। जैसाकि मैंने पहले ही कहा है कि एक समय था जब गाय का माँस खाना इतना सार्वभौमिक था कि किसी ने भी इसकी वास्तविकता को जानने का प्रयास नहीं किया। तब भी कुछ वध किये हुए पशु का माँस और कुछ मृत पशु का माँस खाते थे, इसका केवल आर्थिक महत्त्व था। परन्तु कोई धार्मिक या सामाजिक महत्त्व नहीं था। परन्तु जब सभी ने गाय का माँस खाना बन्द कर दिया और जिन्होंने खाना जारी रखा, इससे एक अन्तर दिखाई दिया जो कि खुली आँखों से देखा जा सकता है और धार्मिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। अतः यह स्वाभाविक है कि अन्तर इतना स्पष्ट एवं महत्त्वपूर्ण है कि इसको शेष लोगों ने इस वर्ग को एक अलग दर्जा देने का आधार बना लिया। परन्तु महार शब्द की इस उत्पत्ति से कठिनाई उत्पन्न हुई जिसका समाधान किया जाना अपेक्षित है। यदि यह इस शब्द की सही परिभाषा है और यदि इसके प्रचलन के यही कारण हैं तो इसका प्रचलन तभी से हो जाना चाहिए था जब अन्तर अत्यधिक एवं महत्त्वपूर्ण हो गया था। जब महारों को महार कहा जाने लगा तो इससे पूर्व वह इतिहास में किस नाम से जाने जाते थे। इसे स्वीकार करने में कोई संदेह नहीं कि एक नया नाम है क्योंकि ध्यानेश्वर के समय से पूर्व साहित्य या इतिहास में कहीं भी यह नाम नहीं आया है। लेकिन इससे एक अन्य प्रश्न अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि इनको नाम सामान्य नाम बन जाने से पूर्व किस नाम से पुकारा जाता था। अब यह भली भाँति विदित है कि महारों को परवारी भी कहा जाता है। यह नाम कभी भी लुप्त नहीं हुआ और उनके महार नाम के साथ हमेशा से विद्यमान रहा है यद्यपि महार बहुत प्रसिद्ध हो गया। परन्तु एक समय था जब परवारी नाम महार नाम की अपेक्षा प्रमुखता से प्रयोग किया जाता था। उदाहरण के लिए ईस्ट इण्डिया कम्पनी के समय कम्पनी की सेना में महारों की सैनिकों तथा अधिकारियों के रूप में काफी भर्ती की गई। इन की जाति के कालम में परवारी भरा जाता था। अतः इसमें कोई प्रश्न नहीं कि महारों का यह उनका दूसरा नाम है। और मैं यह कहने का जोखिम उठाता हूँ कि यह वही नाम था जिसके द्वारा महारों को महार नाम मिलने से पूर्व पुकारा जाता था। कि यह परवारी नाम बहुत प्राचीन नाम है, यह इस तथ्य से सिद्ध होता है कि इस का प्रयोग पटोलमी में हुआ। उन्होंने शब्द ‘पोरावर्दी’ का प्रयोग कि है जो संभवतः परवारी शब्द का गलत उच्चारण या वर्तनी का गलत प्रयोग है।