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गांधी जी की आपत्ति पर डॉ. अम्बेडकर के विचार
सेवा में,
सम्पादक,
’द टाइम्स ऑफ इण्डिया’
महोदय,
बम्बई में हुई ए. आई. सी. सी. की बैठक में गांधीजी के उद्गारों पर दो प्रकार
की राय देखी गई है।
पहली तो यह कि वहाँ गांधीजी का प्रदर्शन अत्यंत चतुराई भरा था जो एक
साधारण व्यक्ति की क्षमता से कहीं आगे था, और गांधीजी ने अपने प्रदर्शन से सविनय
अवज्ञा के विक्षोभ को दरकिनार कर दिया। मेरे लिए तो ये दोनों विचार विस्मित कर
देने वाले हैं। इतने महत्वपूर्ण मामलों पर लोग इतने हल्के तरीके से जनमत तैयार
करें, यह देखकर जनता की विशेष रूप से हिन्दू जनता की विचार क्षमता पर क्षोभ
होता है। मेरी समझ में नहीं आता कि गांधीजी किस प्रकार सविनय अवज्ञा से बचना
चाहते हैं। यह सही है कि गांधीजी युद्ध के विरुद्ध अपनी बात कहने की स्वतंत्रता
चाहते हैं और यह कहना चाहते हैं कि लोग युद्ध में भागीदारी न करें अथवा तन
या धन से सहयोग न करें। परन्तु इसका तात्पर्य क्या है? मेरे विचार से तो इसका
तात्पर्य और कुछ नहीं बल्कि डिफेंस ऑफ इण्डिया एक्ट की सविनय अवज्ञा है।
हिन्दू जनता गांधीजी के इस आह्वान का अर्थ निरूपण सविनय अवज्ञा के रूप में
क्यों नहीं करती, यह मेरी समझ से परे है।