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भारतीय संकट के समाधान की डॉ. अम्बेडकर की योजना
मुसलमानों की मांग की आलोचना
‘‘जनरल च्यांग काई शेक ने ब्रिटिश सरकार से अपील की है कि वह भारत के लोगों से माँग किए जाने की प्रतीक्षा किए बिना उन्हें वास्तविक राजनैतिक सत्ता शीघ्र सौंप दे। परन्तु इस परिपूर्ति के मार्ग में आने वाली कठिनाइयों का कोई समाधान इन्होंने नहीं बताया है’’, ये उद्गार डॉ. बी. आर. अम्बेडकर ने प्रेस से बातचीत करते हुए व्यक्त किए।
कठिनाई वायसराय द्वारा जारी अगस्त घोषणापत्र की आधारभूत विशेषताओं को कांग्रेस द्वारा स्वीकार न किए जाने के कारण उत्पन्न हुई है जिसमें कहा गया है कि भारत के भावी संविधान में भारत के राष्ट्रीय जीवन के कतिपय महत्वपूर्ण तत्वों की सहमति अवश्य होनी चाहिए। इसी प्रकार, कठिनाई ब्रिटिश सरकार द्वारा अपना दायित्व महसूस न किए जाने के कारण भी उत्पन्न हुई है।
कांग्रेस किसी भी सुविज्ञ व्यक्ति से, जो भारत की दशा के बारे में जानता हो, हिन्दू बहुसंख्यकों के हाथों में महज इसलिए कि वे बहुसंख्यक हैं, देश को दे देने की आशा नहीं कर सकती। कांग्रेस यह आसानी से भूल जाती है कि हिन्दुत्व फासीवादी अथवा नाजीवादी विचारधारा के लक्षणों जैसी ही एक राजनैतिक विचारधारा है जो घोर अलोकतांत्रिक है। यदि हिन्दुत्व को छूट दे दी जाए, जो बहुसंख्यक हिन्दू चाहते हैं, तो यह हिन्दुओं से अन्य लोगों और जो हिन्दुत्व के विरोधी हैं, की प्रगति के लिए एक खतरा सिद्ध होगा। यह वैचारिक दृष्टिकोण केवल मुसलमानों का ही नहीं है। दलित वर्गों और गैर-ब्राह्मणों का भी यही दृष्टिकोण है। सत्ता का बंटवारा जरूरी
इसका प्रतिकारक उपाय एक ऐसा संविधान है जिसमें सत्ता का बंटवारा ब्रिटिश भारत के राष्ट्रीय जीवन के विभिन्न तत्वों के बीच किया गया हो। यदि लोकतंत्र के लिए भारत को सुरक्षित रखा जाना हो तो ब्रिटिश हाथों से भारतीय हाथों में सत्ता