16. भारतीय संकट के समाधान की डॉ. अम्बेडकर की योजना - Page 61

42 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

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लेकिन मि. एमरी यह समझते हैं कि वह रुक सकते हैं। उन पर लगाए जाने वाले इस लांछन के अलावा कि वह भारतीय राजनैतिक पार्टियों के बीच व्याप्त मतभेद को भारत की प्रगति को रोकने का बहाना बना रहे है, मुझे ऐसा लगता है कि वह, अपनी जिम्मेदारियों को समझ पाने में पूरी तरह असफल रहे हैं। ब्रिटिश सरकार को मात्र यह अधिकार नहीं है कि वह सर्वसम्मत समाधान पेश करने के लिए भारतीय लोगों से अपील करे बल्कि उसका यह कर्त्तव्य इसलिए बनता है कि ब्रिटिश सरकार भारत के लोगों को एक संवैधानिक गतिरोध को दूर करने के एक महत्वपूर्ण अंतिम साधन और शायद एकमात्र साधन से वंचित कर रही है। वह युद्ध के साधन से अन्य और कोई साधन नहीं है। कुछ लोगों को इससे सदमा जरूर लगेगा। लेकिन हम यह न भूलें कि चाहे अंग्रेजी क्रांति हो, या फ्रांस की क्रांति या अमेरिकी क्रांति; ये ऐसे उदाहरण हैं जब संवैधानिक गतिरोध को युद्ध से ही सुलझाया गया था। इस साधन का प्रयोग करना ब्रिटिश सरकार द्वारा सबकी भलाई के लिए निषेधादेश निकालना होगा। तात्पर्य यह है कि जब विवाद का निपटारा किसी पार्टी की हठधर्मिता या अडि़यल रवैये के कारण न हो सके तो विवाद निपटाने के लिए वह स्वयं बीच में आए।

जब ऐसी स्थिति है तो ब्रिटिश सरकार संवैधानिक मतभेद को निपटाने की जिम्मेदारी भारत के लोगों के कंधों पर डालकर बच नहीं सकती। उसे यह समझ लेना चाहिए कि इस मामले में अंतिम उŸारदायित्व उसी का हे। ऐसा मेरा अभिमत है। मेरा विचार है कि ब्रिटिश सरकार के लिए निम्नलिखित दिशा-निर्देशों पर घोषणा पत्र जारी करना संभव है :-

(1) शांति की तारीख से तीन वर्षों के भीतर भारत को उपनिवेश का दर्जा देने

का प्रस्ताव किया जाता है।

(2) इस प्रयोजन के शीघ्र निष्पादन हेतु भारत के राष्ट्रीय जीवन के पक्षकारों को

अपने संवैधानिक मतभेदों का सहमत समाधान युद्ध विराम पर हस्ताक्षर की

तारीख से एक वर्ष के भीतर प्रस्तुत करना अपेक्षित होगा।

(3) सहमति न बनने पर, ब्रिटिश सरकार इस विवाद को एक अन्तर्राष्ट्रीय अधिकरण

के समक्ष निर्णयार्थ प्रस्तुत करेगी।

(4) जब ऐसा निर्णय प्रस्तुत किया जाता है तो ब्रिटिश सरकार इसे भारत के लिए

औपनिवेशिक संविधान के भाग के रूप में कार्यान्वित करने का अभिवचन

देती है।