16. भारतीय संकट के समाधान की डॉ. अम्बेडकर की योजना - Page 62

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ऐसी घोषणा से सभी विचारशील लोग संतुष्ट होने चाहिए। जहाँ तक मेरा मानना है यह श्री जिन्ना के वैचारिक दृष्टिकोण और दलित वर्गों के दृष्टिकोण के अनुरूप है कि साम्प्रदायिक समस्या का सर्वसम्मत हल ढूंढा जाना चाहिए। यह कांग्रेस की वैचारिक स्थिति के भी अनुरूप है कि ब्रिटिश भारत के राष्ट्रीय जीवन के किसी तत्व को औपनिवेशिक संविधान के जन्म के संबंध में वीरों की शक्ति नहीं दी जानी चाहिए। यह तर्क, कि अभी तो हम युद्धरत हैं ऐसी घोषणा जारी न करने का कोई तर्क नहीं है। निःसंदेह यह तर्क इसके पक्ष में है।

युद्ध का प्रयास तीन बातों पर निर्भर है :-

(1) अत्यावश्यकता का भाव, (2) युद्ध के प्रयोजन का बोध, और (3) इस बात की ठोस अवधारणा कि हम युद्ध कैसे जीत सकते हैं - वास्तविक एवं युक्तिसंगत योजना की आवश्यकता। युद्ध में जापान के कूद पड़ने से भारत के लोगों के लिए अत्यावश्यकता की स्थिति आ गई है, कम से कम उन लोगों के लिए जो यह समझते हैं कि आसन्न विनाश से अपने आपको बचाना अंतिम उद्देश्य को प्राप्त करने से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। युद्ध के प्रयोजन की समझ का अभी अभाव है और ब्रिटिश सरकार द्वारा भारतीय लोगों के पक्ष में अपने प्राधिकार को वापस ले लेने से वह समझ भी उत्पन्न होगी।

क्या घोषणा के साथ एक राष्ट्रीय सरकार का होना भी जरूरी है? यदि ऐसा किया जा सकता हो तो बेहतर होगा। लेकिन श्री जिन्ना दो माँगें रख रहे हैं। एक तो अंतिम है, अर्थात पाकिस्तान। दूसरी तात्कालिक है अर्थात मंत्रिमंडल में 50 प्रतिशत प्रतिनिधित्व। पाकिस्तान की माँग मैं भलीभांति समझ सकता हूँ। जब श्री जिन्ना यह कहते हैं कि मुसलमान एक राष्ट्र है। मैं झगड़ा करने का कोई कारण महसूस नहीं करता। जब श्री जिन्ना यह कहते है कि मुसलमानों को पाकिस्तान मिलना चाहिए, क्योंकि वह एक राष्ट्र है तो मैं कहता हूँ कि जरूर ले लो और इस तरह हिन्दुओं की एक बड़ी आबादी भी साथ ले जाओ, जिनकी राष्ट्रीयता आपके अनुसार अलहदा है।

जहाँ तक पाकिस्तान का प्रश्न है, मैं यह बताना चाहता हूँं कि श्री जिन्ना पहले से ही अपनी जीत निश्चित मान रहे हैं। एन. डब्ल्यू. एफ. इस पाकिस्तान का अभिन्न अंग है। जिन्ना को यह स्वीकार करना होगा कि वह एन. डब्ल्यू. एफ. मेजबान नहीं है। मेजबान हैं खान अब्दुल गफ्फार खान। उनकी सहमति के बिना पाकिस्तान हो ही नहीं सकता। पाकिस्तान के पक्ष में धुँआंधार प्रचार करने के बजाए जिन्ना को अपनी ऊर्जा और समय खान अब्दुल गफ्फार खान का मन बदलने में लगानी चाहिए। खैर, यह श्री जिन्ना के लिए विचार करने की बात है।