17. भारतीयों की नियति लोकतंत्र की जीत से जु़ड़ी है - Page 64

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“गांधीजी से कोई भी एक समान व्यवहार करते रहने की अपेक्षा नहीं कर सकता। लेकिन सबने यही किया और प्रत्येक को उनसे जिम्मेदारी की भावना की उम्मीद करने का अधिकार था। इसमें कोई संदेह नहीं हो सकता कि गांधीजी का इस समय एक जनांदोलन छेड़ने का विचार गैर-जिम्मेदाराना भी है और युक्तिहीन भी।“ यह बात भारत सरकार के लेबर मेम्बर माननीय डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने सोमवार की शाम यहां से दिल्ली रवाना होने से पहले द टाइम्स ऑफ इण्डिया के प्रतिनिधि से कही। *

“गांधीजी कोई और तरीका अपनाने की कोशिश क्यों नहीं करते, जैसे सभी पार्टियों के बीच आम राय बनाना? वह सभी राजनैतिक पार्टियों के नेताओं का एक सम्मेलन बुलाकर क्यों नहीं देखते कि उनकी माँगें क्या-क्या हैं और यदि कोई मतभेद है तो उसे निपटाते क्यों नहीं?“

ये सवाल डॉ. अम्बेडकर ने किए। उन्होंने आगे कहा : “कर्त्तव्य की माँंग है कि गांधी जी के आन्दोलन में जिन लोगों का विश्वास नहीं है, उन्हें कुछ कदम उठाकर कथित कार्रवाई पर अमल करने से उन्हें रोकना चाहिए।”

यह समझ पाना कठिन है कि भारत के इतिहास के इतने खतरनाक दौर में गांधी जी ऐसी खतरनाक कार्ययोजना को शुरू करना जरूरी क्यों समझते हैं, डॉ. अम्बेडकर ने आगे कहा :

कुछेक बातें मेरे सामने बहुत स्पष्ट हैं। जहाँ तक भारत का अपने राजनैतिक उद्देश्य को प्राप्त करने का प्रश्न है, इस बात से कोई इंकार नहीं करता कि ब्रिटिश सरकार से भारत के लोगों को सŸा का हस्तांतरण एक सतत प्रक्रिया रही है और हाल के दिनों में भारत की स्वततंत्रा के प्रति भावातिरेक रखने वाले लोगों के विचारों को छोड़कर इस प्रक्रिया में तेजी भी आई है। इन भावातिरेकी देशभक्तों को छोड़ दिया जाए तो यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं कि ब्रिटिश और भारत के लोगों का साथ अब अपने अंतिम दौर में है। यह बात भी उतनी ही साफ है कि ब्रिटिश भी इस अंतिम

* 27 जुलाई, 1942