17. भारतीयों की नियति लोकतंत्र की जीत से जु़ड़ी है - Page 66

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द्वारा प्रस्तावित यह कदम किस प्रकार देशहित में कहा जा सकता है।

मुझे तो लगता है कि गांधीजी और कांग्रेस युद्ध शुरू होने से अपनी खोई प्रतिष्ठा को फिर प्राप्त करने का प्रयत्न कर रहे हैं।

“कांग्रेस की प्रतिष्ठा दो तरीकों से ही कायम रह सकती है। यह सीधी कार्रवाई की चकाचौंध से कायम रह सकती है या फिर पद के कारण उसे जो संरक्षण प्राप्त है उससे। गांधीजी ने तो कांग्रेस को पद छोड़ने के लिए विवश कर दिया और वह सीधी कार्रवाई में भी पार्टी के साथ शामिल नहीं हुए। गांधीजी की इस कुछ न करने की नीति से कांग्रेस की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंची है और यह कांग्रेस और गांधीजी के लिए विनाशकारी सिद्ध हुई है एवं गांधीजी अब जो कुछ कर रहे हैं वह अपनी खोई प्रतिष्ठा और गरिमा को वापस पाने के लिए कर रहे हैं।

यह कदम चाहे कांग्रेस पार्टी के सर्वोत्तम हित में उठाया गया हो, परन्तु यह देश की सेवा करने का कोई तरीका नहीं है। इस समय तो यह कदम अत्यंत शरारतपूर्ण है और निश्चित रूप से इसके परिणामस्वरूप देश का लिए अधिकतम नुकसान होगा।

इस देश की राजनैतिक गतिविधियों को आगे बढ़ाने के लिए कांग्रेस पार्टी के सामने दो रास्ते खुले हैं; कांग्रेस द्वारा कार्रवाई और देश के राष्ट्रीय जीवन के विभिन्न पक्षों का प्रतिनिधित्व करने वाली सभी पार्टियों द्वारा संयुक्त माँग। गांधीजी और कांग्रेस पहले रास्ते के प्रति उत्सुक हैं। यह एक सामान्य योजना है। गांधीजी को छोड़कर, हर व्यक्ति यह बात जानता है कि एक सीमा के बाद इस कार्रवाई की कोई उपयोगिता नहीं, चाहे इसमें सफलता भी मिले; क्योंकि नाजी सरकार के विपरीत ब्रिटिश सरकार नैतिक आंदोलन का दमन अनैतिक साधनों से करने की आदी नहीं है। गांधीजी इसे स्वीकार नहीं करेंगे। सौभाग्यवश, उन्हें इस बात का अनुभव नहीं है कि उनके सविनय अवज्ञा आंदोलन से नाजी कैसे निपटते। इसमें संदेह नहीं कि नाजी गांधीजी को थोड़ा वक्त देते और साबित कर देते कि सीधी कार्रवाई की उनकी योजना को शुरुआत में ही नाकाम किया जा सकता है।

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“जो प्रश्न मेरे मन को झकझोरता है वह यह हैः गांधी जी केवल कांग्रेस द्वारा की जाने वाली सीधी कार्रवाई का सहारा क्यों लेते हैं, जो नाकामयाब सिद्ध हो चुकी है? क्यों नहीं वह कोई और तरीका अपनाते जैसे सभी पार्टियों के बीच एकता स्थापित करना? गांधीजी विभिन्न पार्टियों के सभी नेताओं का एक सम्मेलन बुलाकर पता क्यों नहीं लगाते कि उनकी माँगें क्या-क्या हैं और उनके बीच यदि कोई विवाद है, तो उसे निपटाते क्यों नहीं? उन्हें ऐसी कोशिश करनी चाहिए। यह राजनेता होने का एक गुण है और इससे विभिन्न समुदायों के बीच स्थायी शांति कायम होगी। लेकिन गांधीजी ने ऐसा प्रयास कभी नहीं किया और समस्या को सुलझाने के इस तरीके से बचते रहने