17. भारतीयों की नियति लोकतंत्र की जीत से जु़ड़ी है - Page 67

48 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

के उनके कारण को मैं अब तक समझ नहीं पाया हूँ। यह कहना कि अंग्रेजों के रहते कोई बन्दोबस्त हो नहीं सकता; इस बात के केवल दो अर्थ निकलते हैंः कि अल्पसंख्यक समुदायों के नेता अंग्रेजों के हाथों की कठपुतलियां हैं या कांग्रेस यह समझती है कि साम्प्रदायिक बंदोबस्त की बात ब्रिटिश सरकार के चले जाने के बाद करना बेहतर रहेगा क्योंकि तब कानून और व्यवस्था कांग्रेस के हाथों में होगी और तब वह अल्पसंख्यकों पर नियंत्रण करने और अपनी शर्तों पर बंदोबस्त करने के लिए बेहतर स्थिति में रहेगी। यदि पहला अर्थ सही है तो यह अल्पसंख्यक समुदायों के नेताओं के चरित्र पर लगाया गया घृणित एवं निरर्थक लांछन है। कांग्रेस को आत्मश्लाघा की यह मनोवृत्ति त्याग देनी चाहिए और यह स्वीकार करना चाहिए कि उससे वैचारिक मतभेद रखने वाले लोग भी उतने ही देशभक्त हैं और मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि अल्पसंख्यक समुदायों के नेताओं के विरुद्ध कांग्रेस और इसकी प्रेस जो मूर्खतापूर्ण एवं आधारहीन आरोप लगातार लगाती रही है उसके कारण साम्प्रदायिक समस्या के समाधान में कठिनाइयाँ ही उपजती रही है। यदि दूसरा अर्थ सही है तो निःसंदेह यह मिथ्याभिमानपूर्ण कदम है। मामला चाहे कुछ भी हो, यह गांधीजी के राजनीतिक दिवालिएपन को घोषित करता है।

“एक बात गांधीजी ने महसूस नहीं की है, जिसे वह जितनी जल्दी महसूस करें उतना ही बेहतर होगा। हिन्दू-मुस्लिम एकता स्थापित करना और अछूतों की सेवा करना उनके सर्वाधिक प्रचारित एवं विज्ञापित राजनैतिक गुण थे।”

‘‘20 वर्ष बाद न तो मुसलमानों की गांधीजी में आस्था है और न ही अछूतों की। यह उनके जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी है।”

“यह बात गांधीजी जितनी जल्दी महसूस करें उतना बेहतर है। गांधीजी अभी भी अल्पसंख्यक नेताओं को विचार-विमर्श के लिए बुला सकते हैं। यह कहने का कोई अर्थ नहीं कि वे असंभव माँगें कर रहे हैं इसके बारे में अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता की अपील करने का रास्ता उनके लिए सदैव खुला है।”

गांधीजी की इस भूमिका पर आम जनता को उन्हें समर्थन करने का कोई कारण नहीं है और यह जरूरी भी नहीं। अल्पसंख्यकों को गांधीजी का समर्थन करने का कोई कारण नहीं है क्योंकि उन्होंने नए संविधान जो स्पष्ट है और भावनात्मक रूप से निष्कपटता का पूर्ण प्रमाण है के अंतर्गत उनकी सुरक्षा और हिफाजत का आश्वासन देने से इंकार कर दिया है।

“हम ऐसे खतरनाक समय में जी रहे हैं कि केवल गांधीजी के साथ असहमति व्यक्त कर देने से हमारे कर्त्तव्य की इतिश्री नहीं हो जाती। कर्त्तव्य तो यह बनता है कि जिनकी इस आंदोलन में आस्था नहीं है उन्हें इसे आकार लेने से रोकने के लिए कदम उठाने चाहिए। 1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में मुसलमानों और दलित वर्गों ने चाहे भाग न लिया हो, परन्तु इन लोगों ने एक तरह की सद्भावनापूर्ण तटस्थता दिखाई थी। 1930 की स्थिति आज की स्थिति से बहुत भिन्न थी। 1930 के आंदोलन