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में केवल दो संभावनाएँ थीं। या तो राजनैतिक सत्ता अंग्रेजों के पास रहती या फिर भारत के लोगों को सौंप दी जाती। जापान या जर्मनी के बीच में आने और भारत पर अपना प्रभुत्व जमाने की कोई संभावना नहीं थी। यह संभावना अब हमारे सामने आ
खड़ी हुई है। अब जब आक्रांता हमारे द्वार तक आ पहुंचे हैं और न केवल अंग्रेजों को हराना बल्कि हमें भी गुलाम बनाना चाहते हैं, कानून और व्यवस्था को कमजोर करना पागलपन होगा। 1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन और गांधीजी जिस जनांदोलन को अब छेड़ने की बात कर रहे हैं उन दोनों के बीच मुझे यही अंतर दिखाई देता है।
झूठा दावा
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“कांग्रेस और गांधीजी देश के लिए बोलने की अनधिकार चेष्टा कर रहे हैं। यह झूठा दावा है जिसे किसी ने चुनौती देने की चेष्टा नहीं की है। यह इसलिए कि जब तक कांग्रेस देश के हितों को नुकसान नहीं पहुँचाती तब तक यह छोटी सी बात है चाहे वह राष्ट्र के नाम पर बोलने का दावा करें या पार्टी के नाम पर। लेकिन महज एक पार्टी होते हुए यदि कांग्रेस कोई ऐसी नीति चलाना चाहती है जिससे देश की सुरक्षा और देश की स्वतंत्रता खतरे में पड़ती हो, तो अन्य पार्टियों का भी यह कर्त्तव्य है कि वे अपना सद्भावपूर्ण तटस्थता का दृष्टिकोण त्याग दें और कांग्रेस का विरोध करें जब वह देश को अराजकता में झोंकने और देश के राजनैतिक भविष्य को निराशा के गर्त में झोंकने पर आमादा हो। मैं चाहता हूँ कि भारत के लोग दो बातों को महसूस करें : पहली यह कि उनका भविष्य नाजीवाद के विरुद्ध लोकतंत्र की जीत से जुड़ा हुआ है और दूसरी, यह कि एक बार लोकतंत्र की जीत होने पर भारत को स्वतंत्रता प्राप्त करने से कोई नहीं रोक सकता यदि भारत के लोग एकजुट रहने की क्षमता रखते हों। मेरा दृढ़ विश्वास है कि गांधीजी का कदम गैर-जरूरी है।
“यदि लोकतंत्र की जीत होती है तो भारत की स्वतंत्रता में कोई आड़े नहीं आ सकता। इस समय भारत के लोगों का सबसे बड़ा काम लोकतंत्र की विजय सुनिश्चित करना है। यह जरूरी नहीं कि केवल सिद्धांत की खातिर वे ऐसा करें। यह हमारे देश का भविष्य है जो हमसे कर्त्तव्य स्वरूप ऐसा करने की अपेक्षा रखता है। गाधीजी एक जल्दबाज वयोवृद्ध व्यक्ति हैं। भारत के लोगों को यह सावधानी बरतनी चाहिए कि वे जल्दबाजी में ऐसा कुछ न करें जिसके लिए बाद में उन्हें पछताना पड़े।”
डॉ. अम्बेडकर बम्बई से सोमवार की रात फ्रंटियर मेल से नई दिल्ली रवाना हो गए। उन्हें बम्बई सेन्ट्रल स्टेशन पर अनुसूचित जातियों, इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी, म्युनिसिपल कामगार संघ तथा अन्य संगठनों के प्रतिनिधियों, मित्रों व उनके प्रशंसकों सहित लगभग 400 लोगों ने विदाई दी।” ख्1,
1 द टाइम्स ऑफ इंडिया, दिनांक 28 जुलाई, 1942 ***