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एक अनुसूची तैयार की जानी चाहिए जिसमें उन जिलों की सूची शामिल हों, जिन्हें सीमा आयोग ने मुस्लिम बहुल जिले करार दिया हो। इसे अनुसूचित जिलों की अनुसूची कहा जाना चाहिए।
यह करने के बाद, अगले कदम के तौर पर मुसलमानों को जनमतसंग्रह द्वारा निम्नलिखित विकल्पों में से एक विकल्प का फैसला करने की अनुमति दी जानी चाहिएः-
अनुसूचित जिलों को दस वर्ष तक संयुक्त भारत का भाग बने रहने देने हेतु सहमत होना, जिसके अंत में उन्हें अनुसूचित जिलों को अलग करके पाकिस्तान बनाने की अनुमति होगी, अथवा अनुसूचित जिलों को मिलाकर एक अलग देश पाकिस्तान बनाने का निर्णय लेना और पाकिस्तान को पाकिस्तान और हिन्दुस्तान द्वारा सहमत शर्तों पर दस वर्ष बाद किए जाने वाले जनमतसंग्रह के आधार पर हिन्दुस्तान के साथ मिल जाने की अनुमति देना।
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यदि मुसलमान पाकिस्तान बनाने का निर्णय करते हैं तो साझा सरोकारों से जुड़े मसलों पर बातचीत करने के लिए एक कौंसिल ऑफ इण्डिया का गठन किया जाए जिसमें हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के प्रतिनिधियों की संख्या बराबर होगी। यदि दस वर्ष बाद पाकिस्तान देश हिन्दुस्तान के साथ मिल जाने का निर्णय करता है, तो यह कौंसिल भंग कर दी जाएगी।”
डॉ. अम्बेडकर ने इस बात पर जोर दिया कि उनके सुझाव के अनुसार पारित अधिनियम के तुरंत बाद जनमतसंग्रह कराना आवश्यक नहीं है। इसे युद्ध के बाद कराया जा सकता है। उनके विचार से अधिनियम पारित करने का हिन्दुओं और मुसलमानों पर सद्भावपूर्ण प्रभाव होगा, क्योंकि दोनों समुदायों को यह ज्ञात रहेगा कि चाहे जो संविधान अस्तित्व में आए इसे लोगों की व्यापक सहमति प्राप्त रहेगी। यदि ऐसी स्थिति निर्मित कर दी जाती है तो इससे युद्ध के दौरान एक राष्ट्रीय सरकार के गठन का मार्ग प्रशस्त हो जाएगा।
अपनी बात का समापन करते हुए डॉ. अम्बेडकर ने कहा “मुझे नहीं लगता कि ऐसे किसी कानून से बचा जा सकता है। इसे अभी या फिर शांति स्थापित होने पर, लेकिन संविधान निर्माण का कार्य शुरू करने से पहले किसी भी स्थिति में पारित करना ही होगा। जहां तक पहले जनमतसंग्रह का प्रश्न है, इसे पाकिस्तान के प्रांतों के मुस्लिम विधान मण्डलों द्वारा पृथक्करण की मांग करने वाले प्रस्ताव के आधार पर किया जाना चाहिए। ख्1,
1 द टाइम्स ऑफ इंडिया, दिनांक 13 मई, 1943 ***