21. दोनों गंभीर गलती कर रहे हैं - Page 76

57

लिखकर गांधीजी ने अपनी विशिष्ट शैली में जिन्ना से कह दिया कि वे महज एक लोहाना है जिसकी मातृभाषा गुजराती है।

इसी प्रकार जिन्ना भी जानते थे कि राजाजी राजगोपालाचारी का फार्मूला मुस्लिम लीग के लाहौर प्रस्ताव से अलग है। जिन्ना यह भी जानते थे कि गांधीजी उनसे व्यक्तिगत स्तर पर मुलाकात कर रहे हैं। जिन्ना यह भी जानते थे कि गांधीजी उनसे हिन्दुओं के प्रतिनिधि के तौर पर नहीं मिल रहे हैं। ये सभी परिस्थितियाँ इन शर्तों के बिल्कुल विपरीत थी जिन पर जिन्ना लाहौर में मात खाने के बाद जोर दे रहे थे।

sr kv
d k
v fM+; y

‘‘बातचीत की असफलता अवश्यंभावी थी। यदि यह दोनों व्यक्तियों के अडि़यल रवैये के कारण अवश्यंभावी थी तो यह सी.आर. फार्मूले के आधारभूत दोषों के कारण भी अवश्यंभावी थी। यह फार्मूलों दोषपूर्ण इसलिए है कि इसमें साम्प्रदायिक मामले और राजनैतिक मामले को मिला दिया गया था। फार्मूले में न तो राजनैतिक समाधान है और न ही साम्प्रदायिक समाधान। फार्मूला कोई समाधान ही प्रस्तुत नहीं करता। इसमें जिन्ना साहब को सौदेबाजी के लिए बुलाया गया था। यह एक सौदा था- यदि आप स्वतंत्रता प्राप्त कराने में हमारी मदद करेंगे तो हम आपके पाकिस्तान के प्रस्ताव पर सहर्ष विचार करेंगे।“

सी. आर. फार्मूले की दूसरी कमी किए जाने वाले समझौते को अमल में लाने वाली मशीनरी से संबंधित है। सी. आर. फार्मूले में सुझाई गई एजेन्सी अन्तरिम सरकार है।

अंतरिम सरकार बनाने की सहमति देकर मुस्लिम लीग ने कांग्रेस को स्वतंत्रता प्राप्त कराने में मदद करने का वायदा पूरा कर दिया होता। लेकिन कांग्रेस द्वारा पाकिस्तान बनाए जाने का वादा शेष रह गया होता। जिन्ना साहब का इस बात पर जोर देना बिल्कुल सही है कि वायदे साथ-साथ निभाए जाने चाहिए और उनसे ऐसी उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह स्वयं को ऐसी स्थिति में रखेंगे।

दूसरी कठिनाई जिसे राजगोपालाचारी जी ने नजरअंदाज कर दिया है, यह है कि यदि अंतरिम सरकार समझौते के हिन्दू भाग को लागू करने में असफल रहती है तब क्या होगा। इस पर अमल कराने का काम कौन करेगा? अंतरिम सरकार एक संप्रभु सरकार बनेगी न कि किसी उच्च प्राधिकारी के अधीन। यदि यह समझौते को कार्यान्वित करने की इच्छुक न हो तो मुसलमानों के लिए केवल विद्रोह का रास्ता बचता है। पाकिस्तान बनाने के लिए कपटपूर्वक एक नए संविधान हेतु अंतरिम