58 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
सरकार की बात को कोई भी स्वीकार नहीं करेगा। यह तो एक जाल हुआ; न कि कोई समाधान। संवैधानिक बदलाव लाने का केवल एक तरीका है और वह है संसद के अधिनियम द्वारा, जिसमें ब्रिटिश भारत के राष्ट्रीय जीवन के महत्वपूर्ण तत्वों द्वारा सहमत प्रावधान शामिल हों। दूसरा कोई और तरीका नहीं है।
सी. आर. फार्मूले में तीसरा दोष भी है। यह पाकिस्तान और हिन्दुस्तान के बीच रक्षा, विदेश संबंध और सीमाशुल्क जैसे साझा हित के मामलों के रक्षोपाय हेतु एक संधि के प्रावधान से संबंधित है। यहाँ भी राजगोपालाचारी जी सामान्य समस्याओं से अवगत प्रतीत नहीं होते।
किसी को भी इस बात पर ज्यादा आपत्ति नहीं है कि बातचीत असफल रही। सबको इस बात का जरूर खेद है कि बातचीत हमें कुछेक सवालों के स्पष्ट उत्तर दिए बिना ही असफल रही जिनके बारे में जिन्ना साहब अपने सार्वजनिक बयानों में चुप्पी साधे रहते थे जबकि व्यक्तिशः वह बातचीत में उनके बारे में हमेशा मुखर रहते।
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| Col1 | Col2 | Col3 |
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ये सवाल इस प्रकार हैं :-
(1) क्या पाकिस्तान की माँग मुस्लिम लीग के प्रस्ताव के कारण मान ली जाए?
(2) इस मामले में क्या मुस्लिम लीग से अलग मुसलमानों की राय मायने नहीं
रखती?
(3) पाकिस्तान की सीमाएँ कौन सी होंगी? क्या ये सीमाएँ वर्तमान पंजाब और
बंगाल की प्रशासनिक सीमाएँ होंगी या पाकिस्तान की सीमाएं जातीय सीमाएं
होंगी?
(4) ऐसे भूभागीय समायोजनों के बारे में लाहौर प्रस्ताव में जिन शब्दों का उल्लेख
किया गया है, उनका आशय क्या है? भूभागीय समायोजनों के बारे में लीग
का क्या दृष्टिकोण था?
(5) लाहौर प्रस्ताव के अंतिम भाग में जिस “अंततः“ शब्द का उल्लेख किया गया
है, उसका आशय क्या है? क्या लीग ने किसी संक्रमण काल का विचार किया
है जिसके दौरान पाकिस्तान एक स्वतंत्र और संप्रभु राज्य नहीं होगा?
(6) यदि जिन्ना साहब का प्रस्ताव यह है कि पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान की