59
सीमाएँ वही हांगी जो मौजूदा प्रशासनिक सीमाएँ हैं तो वह अनुसूचित जातियों,
या मैं यह कहूँ क पंजाब और बंगाल के गैर- मुसलमानों को जनमतसंग्रह
द्वारा यह निर्धारित कैसे करने देंगे कि क्या वे जिन्ना के पाकिस्तान में शामिल
होना चाहते हैं और क्या पंजाब और बंगाल के गैर-मुसलमानों के जनमतसंग्रह
के नतीजों के अनुसार कार्यवाही करने के लिए जिन्ना साहब तैयार होंगे।
(7) क्या जिन्ना साहब एक ऐसा रास्ता चाहते हैं जो उत्तर प्रदेश और बिहार को
पूर्वी पाकिस्तान और पश्चिमी पाकिस्तान से जोड़ता है? कितना फायदेमंद
होता यदि जिन्ना साहब से सीधे सवाल पूछे जाते और उनसे साफ-साफ
जवाब माँगे जाते।
यह कहने के बाद कि पाकिस्तान का प्रश्न महज अकादमिक महत्व का नहीं है और इस पर फिर बातचीत की जाएगी। डॉ. अम्बेडकर ने कहाः “गांधीजी और जिन्ना साहब के बीच पत्रों का जो आदान-प्रदान हुआ है उससे मालूम होता है कि पाकिस्तान के बारे में समझौते के लिए गांधीजी और जिन्ना हिन्दुओं और मुसलमानों को दो जरूरी और सही पक्षकार मानते हैं। इससे यह भी पता चलता है कि जिन्ना वह पाकिस्तान चाहते हैं जिसकी सीमा रेखाएं वही रहें जो अभी हैं और पाकिस्तानी क्षेत्रों के गैर-मुसलमानों की राय जाने बिना ही यह सब कर दिया जाए।
“मुझे यह कहना पड़ रहा है कि इन अवधारणाओं पर आगे बढ़ते हुए गांधी और जिन्ना दोनों गंभीर भूल कर रहे हैं। हिन्दुओं और मुसलमानों के अलावा अनुसूचित जातियाँ तीसरे जरूरी पक्षकार हैं। न गांधी, न कांग्रेस और न ही हिन्दू महासभा को उनके लिए बोलने का हक है। जिन्ना साहब को समझ लेना चाहिए कि उन्हें अनुसूचित जातियों की इतनी बड़ी आबादी को उसकी रजामंदी के बिना साथ लेकर जाने नहीं दिया जा सकता।
‘‘चूंकि पाकिस्तान के सवाल से मेरा भी सरोकार है, मैं अपनी स्थिति बताते हुए यह कहना चाहता हूँ कि अनुसूचित जातियों को उनकी जाहिर रजामंदी के बिना पाकिस्तान के पूर्वी हिस्से में या पश्चिमी हिस्से में शामिल नहीं किया जा सकता। यह रजामंदी जाहिर तौर पर होनी चाहिए और उनके स्वतंत्र जनमतसंग्रह जैसे सकारात्मक तरीके से होनी चाहिए।“ ख्1,
***
1 द टाइम्स ऑफ इंडिया, दिनांक 5 मई, 1944