26. भारत सरकार किसी भी रियासत को संप्रभु स्वतंत्र रियासत के रूप में मान्यता नहीं देगी - Page 86

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भारत को एक स्वतंत्र संप्रभु देश घोषित करने का प्रस्ताव किया गया था और एक प्रश्न यह था कि रियासतों की स्थिति क्या होगी? रियासतों का यह अभिमत था कि वे भी स्वतंत्र संप्रभु राज्य हांगे क्योंकि वे भी ब्रिटिश सरकार के नियंत्रण के अन्तर्गत आते हैं। ‘त्रावणकोर‘ और ‘हैदराबाद‘ प्रमुख रियासतें थीं। कैबिनेट मिशन ने भी इस विचार को स्वीकार कर लिया था, परन्तु डॉ. बी. आर. अम्बेडकर ने इस विचार का विरोध करते हुए बयान जारी किया और बताया कि राष्ट्र के सन्दर्भ में कैबिनेट मिशन का यह विचार कितना गलत है। उन्होंने आगे इस बात पर जोर दिया कि देश की संप्रभुता के हितों में रियासतों का भारत में विलय किया जाना चाहिए। यह बयान इस प्रकार थाः सम्पादक।

वायसराय कार्यकारी परिषद के पूर्व सदस्य एवं प्रख्यात संविधान विशेषज्ञ वकील डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने कतिपय राज्यों द्वारा स्वतंत्रता की घोषणा के विरोध में जारी वक्तव्य में कहा है कि “भारत के राज्यों को सर्वोच्चता से स्वयं को मुक्त करने का एकमात्र तरीका है कि वे संप्रभुता या आधिराज्य में विलय कर लें। यह तभी हो सकता है जब भारत के राज्य भारत संघ में घटक इकाईयों के रूप में शामिल हों।“ डॉ. अम्बेडकर का कहना है कि भारत के राज्य उतने ही संप्रभु रहेंगे, जितने वे हैं, परन्तु यदि भारत स्वतंत्र होता है तो वे तब तक स्वतंत्र नहीं हो सकते जब तक वे ब्रिटिश साम्राज्य के आधिराज्य के तहत रहेंगे। उन्होंने आगे कहा कि राज्यों को यह महसूस करना चाहिए कि प्रभुतासम्पन्न स्वतंत्र राज्यों के रूप में उनके अस्तित्व का कोई अर्थ नहीं रहेगा। डॉ. अम्बेडकर ने आगे कहा कि राज्यों द्वारा स्वयं को स्वतंत्र घोषित करने के अधिकार के दावे का आधार कैबिनेट मिशन द्वारा दिनांक 12 मई, 1946 को जारी उस वक्तव्य में निहित है जिसमें उसने कहा है कि ब्रिटिश सरकार किसी भी परिस्थिति में भारतीय सरकार को सर्वोच्चता का हस्तांतरण नहीं कर सकती और न ही करेगी, जिसका तात्पर्य है कि साम्राज्य से उनके संबंध के कारण राज्यों को प्राप्त अधिकार समाप्त हो जाएंगे और राज्यों द्वारा सर्वोच्च शक्ति को अर्पित किए गए सभी अधिकार राज्यों को वापस हो जाएंगे।