68 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय शरारतपूर्ण सिद्धांत
यह सिद्धांत कि सर्वोच्चता का हस्तांतरण भारतीय सरकार को नहीं किया जा सकता, सर्वाधिक शरारतपूर्ण सिद्धांत है और यह इस मुद्दे में शामिल गलतफहमी पर आधारित है। वेस्टमिनिस्टर स्टैच्यूट पारित होने के परिणामस्वरूप कनाडा, आस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका और आयरलैण्ड अलग-अलग स्वतंत्र उपनिवेश बने हैं और वहाँ साम्राज्य विशेषाधिकार का प्रयोग करते हुए संबंधित स्वतंत्र उपनिवेश के मंत्रिमंडल की सलाह से कार्य करता है। वह ऐसा करने के लिए बाध्य है। वह इसके विपरीत कुछ नहीं कर सकता, इसका तात्पर्य है कि जब भारत स्वतंत्र उपनिवेश बनेगा तब साम्राज्य अपने विशेषाधिकार का प्रयोग करते हुए अर्थात भारतीय मंत्रिमंडल की सलाह के अनुसार कार्य करने के लिए बाध्य होगा। इस सिद्धांत, कि सर्वोच्चता का हस्तांतरण भारत सरकार को नहीं किया जा सकता है, के समर्थक गवर्नमेंट ऑफ इण्डिया एक्ट, 1833 की धारा 39 के प्रावधानों को गवर्नमेंट ऑफ इण्डिया एक्ट, 1935 से हटाए जाने पर विश्वास करते हैं (इन्हें गवर्नमेंट ऑफ इण्डिया एक्ट, 1915-19 की धारा 33 में दोहराया गया था), जिसके अनुसार भारत का नागरिक तथा सैन्य शासन (ब्रिटिश भारत के नागरिक तथा सैन्य शासन से भिन्न) गवर्नर जनरल इन कौंसिल में निहित है और उनका यह तर्क है कि प्रावधानों का लोप किया जाना इस निष्कर्ष का प्रमाण है कि सर्वोच्चता का हस्तांतरण किसी भारतीय सरकार को नहीं किया जा सकता।
साम्राज्य के संवैधानिक कानून के अन्तर्गत जब कोई देश एक स्वतंत्र उपनिवेश बन जाता है तभी वह सम्राट को सलाह देने के अधिकार का दावा कर सकता है और इस तथ्य से उसके दावे का निषेध नहीं होता कि स्वतंत्र उपनिवेश बनने से पूर्व सम्राट को सलाह देने का तरीका भिन्न था। इस तथ्य का विगत में भारत सरकार को अपनी सर्वोच्चता के अधिकार का प्रयोग करते हुए सम्राट को सलाह देने की अनुमति प्रदान नहीं की गई थी आशय यह नहीं है कि कोई ऐसी अंतर्निहित संवैधानिक अक्षमता है जिसके कारण उसे सलाह देने के अधिकार का दावा करने की पात्रता नहीं रह जाती।
| lo | ksZPp |
|---|
| ld | r |
|---|
सर्वोच्चता व्ययगत नहीं हो सकती
अब तक मैंने कैबिनेट मिशन के वक्तव्य के एक भाग का उल्लेख किया है, जिसमें कहा गया है कि सम्राट द्वारा सर्वोच्चता का हस्तांतरण किसी भारतीय सरकार को नहीं किया जा सकता। कैबिनेट मिशन के अनुसार, सर्वोच्चता व्यपगत हो जाएगी। यह अत्यंत विस्मयकारी वक्तव्य है जो संवैधानिक कानून के एक अन्य सुस्थापित