69
सिद्धांत के विरुद्ध है। इस सिद्धांत के अनुसार, सम्राट अपने विशेषाधिकार का अभ्यर्पण अथवा परित्याग नहीं कर सकता। यदि सम्राट सर्वोच्चता का हस्तांतरण नहीं कर सकता तो सम्राट उसका परित्याग भी नहीं कर सकता। इस सिद्धांत की वैधता को 1840 में निर्णीत एवं 5 मूरे प्रिवी कौंसिल मामलों (पृ. 276) में उल्लिखित महारानी बनाम इडुलजी बैरमजी मामले में प्रिवी कौंसिल द्वारा स्वीकार किया गया था, जिसमें (पृ. 294 पर) यह कहा गया है कि सम्राट चार्टर द्वारा भी अपने विशेषाधिकार को अपने से अलग नहीं कर सकता। अतः जाहिर है कि कैबिनेट मिशन का यह वक्तव्य कि सम्राट सर्वोच्चता का प्रयोग नहीं करेगा उस संवैधानिक कानून के विरुद्ध है, जिसके द्वारा ब्रिटिश साम्राज्य शासित होता है।
| v | afr | e |
|---|
| Lo | h— | f | r |
|---|
इसके अलावा, ग्रेट ब्रिटेन की संसद द्वारा सर्वोच्चता का निरसन करते हुए पारित किया गया कानून अमान्य होगा। इसका कारण भी स्पष्ट है। सर्वोच्चता हेतु अंतिम स्वीकृति सेना की होती है। यह सेना भारतीय सेना है, जिसका भुगतान अब तक ब्रिटिश भारत करता रहा है। ब्रिटिश भारत द्वारा अनुरक्षित और एजेन्ट अर्थात वायसराय एवं भारत के गवर्नर जनरल के अधिकार के अधीन रखी गई इस शक्तिशाली सेना की सहायता के बिना सम्राट सर्वोच्चता की शक्ति का निर्माण एवं संरक्षण कदापि नहीं कर सकता था। ये शक्तियाँ भारत के लोगों के लाभार्थ सम्राट के विश्वास के रूप में धारित हैं और उस विश्वास को छिन्न-भिन्न करते हुए ब्रिटिश संसद द्वारा कानून पारित करना सत्ता का घोर दुरुपयोग होगा।
अपनी बात का समापन करते हुए डॉ. अम्बेडकर ने कहा कि भारत की रियासतों की पसंद चाहे जो हो, भारत के लोगों का कर्त्तव्य स्पष्ट है। उनकी ओर से अंतरिम सरकार द्वारा सम्राट को यह सूचित किया जाना चाहिए कि ब्रिटिश संसद को सर्वोच्चता का निरसन करने को कानून पारित करने का कोई अधिकार नहीं है और आगामी विधान में इस आशय की ऐसी कोई धारा जिसमें भारत में स्वतंत्र उपनिवेश बनाए गए हों, उनकी संप्रभुता के प्रतिकूल होगा अतः वह अमान्य होगा और यह घोषणा की जाए कि भारत सरकार किसी रियासत को कभी संप्रभु स्वतंत्र रियासत के रूप में मान्यता नहीं देगी। ख्1, *
****
1 : द टाइम्स ऑफ इण्डिया, दिनांक 18 जून, 1947
पुनर्मुद्रणः खैरमोडे, खण्ड 8 पृ. 195-198
* इस बयान पर की गई टिप्पणियों हेतु परिशिष्ट- IX तथा X देखें ।