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अपने हाथ में आने वाली शक्ति को अमल में लाओ और
उपयोग करो
रविवार, 9 अक्तूबर, 1932 को 10.30 बजे रात बम्बई के इम्प्रूवमेंट ट्रस्ट चॉल
बेलासिस मार्ग पर डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ने सभा को संबोधित किया। सामाजिक
सेवा संघ के मुख्य कार्यकर्ता श्री बापू साहेब सहस्त्रबुद्वे ने सभा की अध्यक्षता की।
श्री एस.एन. शिवतरकर भी उपस्थित थे। ख्1,
डॉ. अम्बेडकर ने अपने स्पष्ट तथा जीवन्त कथन में लोगों को समझाया
कि कैसे वे एक दूसरी दुनिया की अनदेखी खुषी की चाह में एक मृग मरीचिका
की भांति जीवन को संघर्षमय बनाकर जीते रहते हैं और इस दुनिया की भौतिक
शक्तियों पर मस्तिष्क नहीं लगाते।
उन्होंने एक हृदय विदारक अपील करते हुए कहा, ‘‘क्योंकि लोग जीवन की
भौतिक जरूरतों की अनदेखी करते थे और वे उस ज्ञान जिससे भौतिक पदार्थ पाये
जा सकते हैं, से विरक्त हो गये। उससे पूरा देश पिछड़ रह गया और उन्नति पर
रोक लग गई। तुम्हारे गले में डली हुई तुलसी के पत्तों की माला तुम्हें साहूकार के
चुंगल से छुटकारा नहीं दिला सकती। तुम्हें राम के भजन गाने से मकान मालिक से
किराये में कोई राहत नहीं मिल सकती। प्रतिवर्ष पंढरपुर तीर्थ यात्रा से तुम्हें महीने
के अंत में वेतन तो नहीं मिल सकता। क्योंकि समाज के अधिकतर लोग जीवन की
इन व्यर्थ की रहस्यमयी बातों, रहस्यवाद व अंधविश्वास पर आधारित औपचारिकताओं
में लिप्त हैं। कुछ चालाक और स्वार्थी व्यक्ति अपनी समाज विरोधी कारगुजारियों के
लिए पर्याप्त अवसर प्राप्त कर लेते हैं। उन्होंने निष्कर्ष निकालते हुए कहा मैं आपसे
अनुरोध करता हूं कि कुछ कर दिखाओ और अपने हाथ जो भी राजनीतिक शक्ति
आने वाली है, उसका उपयोग करो। अगर तुम विरक्त रहते हो और अपनी शक्ति
का उपयोग नहीं करते तो तुम्हारी चिंताएं अनगिनत हांगी। मेरे मस्तिष्क में एक डर
घर किए हुए है कि जिस दासता के विरुद्ध हम लड़ रहें हैं, कहीं वही दासता हमें
दुबारा न दबोच ले। क्या हमारी यह जागरूकता थोड़े समय तक ही रहेगी?। ख्2,
12 जनता : 15 अक्तूबर, 1932 की, पृष्ठ सं. 213