86 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
नेता पूजा के विचार, नेता पूजा तथा कर्तव्य की अनदेखी ने हिन्दू समाज का विनाश किया है तथा हमारे देश के पिछड़ने के कारण बनें है।’’ उन्होंने बताया, ‘‘दूसरे देशों में राष्ट्रीय विपत्ति तथा संकट के समय लोग एकजुट होकर खतरे को टालने के लिए सक्रिय हो जाते हैं और शांति तथा संपन्नता प्राप्त करते हैं। इसके विपरीत हमारा धर्म हमारे कानों में बार-बार ‘‘मनुष्य कुछ नहीं करता’’ का राग अलापता रहता है और मनुष्य को निष्क्रिय कर देता है। वह एक बेबस लकड़ी के लट्ठे के समान है। किसी भी राष्ट्रीय संकट के समय ईश्वर के अवतरित होने तथा संकट से उभारने की आशा रखी जाती है। सारांश में, शत्रुओं से एकजुट होकर निपटने के बजाय वे इस काम को करने के लिए अवतार लेने की प्रतीक्षा करते रहते हैं’’ *
‘‘इस दासता का उन्मूलन आपको स्वयं ही करना है। इसके लिए ईश्वर या किसी दैविक शक्ति पर निर्भर न रहें। आपकी मुक्ति तो आपकी राजनीतिक शक्तियों में है न कि तीर्थ यात्राओं अथवा उपवास रखने में। धर्मग्रथों के प्रति निष्ठा से आपको अपने दासता के बन्धनों, अभावों व गरीबी से मुक्ति नहीं मिल सकती। तुम्हारे पूर्वज ये सब पीढ़ी दर पीढ़ी करते आये हैं पर उन्हें दुखद जीवन से नाम मात्र भी राहत नहीं मिली। आप अपने पूर्वजों की ही तरह चिथड़े पहनते हो। उनकी तरह तुम फेंके हुए बचे-खुचे टुकड़ों पर जीते हो, उनकी तरह गंदी बस्तियों में गंदी झोपडि़यों में सड़ रहे हो और उन्हीं की तरह बिमारियों के आसान शिकार होते हो और मुर्गियों के चूजों की भांति मरते हो। आपके धार्मिक उपवासों, संयम व प्रायश्चित ने भी आपको भुखमरी से नहीं बचाया।’’
उन्होंने समापन में कहा, ‘‘यह विधानमंडल का कर्तव्य है कि आपको भोजन, कपड़े, आवास, शिक्षा, औषधि व रोजगार उपलब्ध कराये। कानून का निर्माण कार्य और इसे लागू करना जैसे कार्य आपकी स्वीकृति, सहायता व आपकी इच्छा से पारित किए जाएंगे। संक्षेप में, कानून वैश्विक प्रसन्नता का आवास है। आप कानून बनाने की शक्ति पर अपना कब्ज़ा बनाओ। इसलिए अपना ध्यान उपवास, पूजा और प्रायश्चित से हटाकर विधि व्यवस्था निर्माण करने की शक्ति को अपने काबू में करने पर करो। इसी में आप की मुक्ति है। इसी मार्ग से आपकी भुखमरी का अंत होगा। स्मरण रहे कि यह आवश्यक नहीं है कि संख्या में लोगों का बहुमत हो। वे हमेशा सतर्क, शक्तिशाली, सुशिक्षित और आत्मसम्मान के प्रति सजग हों, तभी वे सफल होंगे। ख्1,
1 कीर, पृष्ठ सं. 234-235