22. 16.12.1934 ऐसे प्रतिनिधि चुनें, जो तुम्हारे हितों का संवर्धन करें। - Page 110

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जिनके पास अपनी कोई जमीन नहीं और उन्हें खेतों में अपनी रोटी के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती है। जमीन से दोनों के प्रयोजन अलग-अलग व परस्पर विरोधी हैं। इन दोनां समूहों को एक दूसरे से बांधे रखना सही नहीं है। मेरा सुझाव है कि इन दोनों की भिन्नता को समझ कर शेतकारी की परिभाषा सही की जानी चाहिए।

अब मैं उस प्रश्न पर आता हूं जो सब श्रोताओं विशेषकर ‘‘चारी’’ के लोगों में सबसे अधिक उथल-पुथल किए हुए है। मेरा तात्पर्य ‘‘चारी’’ के काश्तकारों से है जिन्हांने पिछले दो सालों से साहूकारों तथा भूमि मालिकों के विरुद्ध हड़ताल की धमकी दे रखी है। हड़ताल के औचित्य या अनौचित्य में जाए बिना मेरा मानना है कि भूमिपतियों व कास्तकारों के आपसी मतभेद मध्यस्थता के माध्यम से ‘‘समझौता समिति’’ बने जिसमें दोनों पक्ष के प्रतिनिधि तथा एक सदस्य सरकार द्वारा मनोनीत हो। इस समझौता समिति का निर्णय दोनों पक्षों पर बाध्य हो। मुझे कोई कारण समझ नहीं आता कि सरकार इसमें हस्तक्षेप कर समझौता समिति का गठन क्यों नहीं कर रही।

मुझे मालूम है कि इस क्षेत्र में चालू व्यवस्था जिसे ‘खोती व्यवस्था’ के नाम से बुलाते हैं के विरुद्ध बहुत सी शिकायतें हैं। मुझे ज्ञात है कि कैसे खोत काश्तकारों को बड़ी दयनीय स्थिति में जब चाहे तब निकाल फेंकते हैं। भूपति अपनी इच्छा पर कभी भी काश्तकारों को अपनी जमीन से बेदखल कर उनके जीवन को अस्थिर और दयनीय बना देता है। यह एक सहज में ही दिखने वाला अन्याय है, जिसका कष्ट काश्तकार को झेलना पड़ता है। बिना औपचारिकता अपनाए खोत को कास्तकार को बेदखल करने की मिली शक्ति से काश्तकार द्वारा मिट्टी सुधारने हेतु कई वर्षो की गई कड़ी मेहनत से वंचित कर दिया जाता है।

काश्तकारों की इस प्रकार की शिकायतें कानून बनाकर तुरन्त दूर की जा सकती हैं। ऐसे वंचित काश्तकारों का समाधान उनकी मेहनत का पर्याप्त मुआवजा

खोतों द्वारा देने को मजबूर करने के प्रावधान से हो सकता है। भू-स्वामी द्वारा

खोती की जमीन पर बने काश्तकारों के रहने के घर को गिराने की धमकियों की घटनाओं से मेरे विचार से ऐसे अन्याय पराकाष्ठा तक पहुंच चुके हैं क्यांकि जब भी

खोत और काश्तकार के बीच झगड़ा होता है भू-स्वामी की इच्छा अनुसार काश्तकार को मजबूर किया जाता है। यह मेरी समझ से बाहर है कि ऐसे आँखों में खटकते अन्याय क्यों चलने दिए जाते हैं। मैं बेहिचक कह सकता हूं कि इस गंभीर आरोप के लिए सरकार भी दोषी है, क्योंकि वे इस अमानवीय अन्याय के मूकदर्शक बनकर मौन स्वीकृति दे रहे हैं। कई बम्बई के मिल मालिक जो आवासीय सुविधा प्रदान